Sunday, 23 February 2020

Panchtantra ki kahaniyan "धूर्तों की संगत"


           Panchtantra ki kahaniyan अपने आप में काफी कुछ संजो के रखती हैं यह सिर्फ एक कहानी न हो कर ज्ञान और खास कर नैतिक ज्ञान को सहेज कर प्रस्तुत करती हैं और अगर देखा जाय तो वो सब जो हमारे व्यक्तित्व को परखता है और फिर दिशा देने का प्रयत्न करता है वह ज्ञान कहलाता है और कहानियाँ इसका एक अभिन्न अंग होती हैं तो इसी कडी में एक रोचक पंचतन्त्र की कहानी है धूर्तों की संगत ।

"धूर्तों की संगत" Panchtantra ki kahaniya in hindi

           एक जंगल था, जंगल में मदोत्कट नाम का शेर निवास करता था । एक बूढा बाघ, धूर्त सियार और चापलूस कौवा ये तीनों उसके नौकर थे । एक दिन चारों धूप में बैठे सुस्ता रहे थे कि उन्होंने एक ऊँट को अपनी ओर आते देखा जो अपने झुण्ड से भटक कर जंगल की ओर आ गया था । उसको देखकर शेर कहने लगा, “अरे वाह, यह तो विचित्र जीव है । जाकर पता तो लगाओ कि यह वन्य जीव है या  ग्राम्य प्राणी” यह सुनकर कौआ बोला, “स्वामी, यह ऊँट नामक जीव ग्राम्य  प्राणी है और आपका भोजन है । आप इसको मारकर खा जाइए"।
शेर बोला, “मैं अपने यहाँ आने वाले अतिथि को नही मारता । कहा गया है कि विश्वस्त और निर्भय होकर अपने घर आए शत्रु को भी नही मारना चाहिए । अतः उसको आदर पूर्वक यहाँ मेरे पास ले आओ जिससे मैं उसके यहाँ आने का कारण पूछ सकूँ" ।
Panchtantra ki kahaniyan
Panchtantra ki kahaniyan
          शेर की आज्ञा पाकर उसके अनुचर ऊँट के पास गए और उसको आदर पूर्वक शेर के पास ले आये । ऊँट ने शेर को प्रणाम किया और बैठ गया । शेर ने जब उसके वन में विचरने का कारण पूछा तो उसने अपना परिचय देते हुए बताया कि वह साथियों से बिछड कर भटक गया है । शेर के कहने पर उस दिन से वह कथनक नाम का ऊँट उनके साथ ही रहने लगा ।
          उसके कुछ दिन बाद शेर का एक जंगली हाथी के साथ घमासान युद्ध हुआ । उस हाथी के मूसल के समान दाँतों के प्रहार से शेर अधमरा तो हो गया किन्तु किसी तरह जीवित रहा, पर वह चलने - फिरने में अशक्त हो गया था । उसके अशक्त हो जाने से कौवे आदि उसके नौकर भूखे रहने लगे । क्योंकि शेर जब शिकार करता था तो उसके नौकरों को उसमें से भोजन मिला करता था । किन्तु अब शेर शिकार करने में असमर्थ था ।
          उनकी दुर्दशा देखकर शेर बोला, “मैं तो शिकार करने में असमर्थ हूँ इसलिए तुम किसी ऐसे जीव की खोज करो कि जिसको तुम आसानी से मार सको और हम लोगों के भोजन की व्यवस्था हो सके" । शेर की आज्ञा पाकर वे चारों जंगल के हर तरफ शिकार की तलाश में निकले, जब कहीं कुछ नही मिला तो कौवे और सियार और बाघ  ने परस्पर मिलकर सलाह की । सियार बोला, “मित्रो, इधर - उधर भटकने से क्या लाभ ? क्यों न इस कथनक को मारकर उसका ही भोजन किया जाए” ?
          सियार शेर के पास गया और वहाँ पहुँचकर कहने लगा, “स्वामी, हम सबने मिलकर सारा वन छान मारा है, किन्तु कहीं कोई ऐसा पशु नही मिला कि जिसको हम मार पाते और अपने महाराज की भूख शांत कर पाते । अब भूख इतनी सता रही है कि हमारे लिए एक भी पग चलना कठिन हो गया है । आप बीमार हैं । यदि आपकी आज्ञा हो तो आज कथनक के माँस से ही आपके खाने का प्रबन्ध किया जाय” ।
            शेर ने यह कहते हुए मना कर दिया कि उसने ऊँट को अपने यहाँ पनाह दी है इसलिए वह उसे मार नही सकता । पर सियार ने शेर को किसी तरह मना ही लिया । राजा की आज्ञा पाते ही सियार तत्काल अपने साथियों को बुला लाया और चुपचाप कौवे और बूढे बाघ को समझा दिया कि शेर के सामने अपने प्राण देने का ढोंग करना है वो उन्हें बचा लेगा । उसके साथ ऊँट भी आया, उन्हें देखकर शेर ने पूछा, “तुम लोगों को कुछ मिला” ?

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          कौवा, सियार, बाघ सभी जानवरों ने बता दिया कि उन्हें कुछ नही मिला । पर अपने राजा की भूख मिटाने के लिए सभी बारी - बारी से शेर के आगे आए और विनती की कि वह उन्हें मारकर खा लें । पर सियार हर किसी में कुछ न कुछ खामी बता देता ताकि शेर उन्हें न मार सके।
कौवा बोला - "मालिक इतने दिन तक आपने मेरा लालन पालन किया आपकी दसा मुझसे देखी नही जाती आप मुझे मार कर भोजन कर लीजिये" ।
तो सियार तपाक से बोला - "तुम तो बहुत छोटे हो दोस्त इससे महाराज की भूख कहाँ शांत होगी" ।
बाघ बोला - " तो महारज मुझे मार कर आप भोजन कर लीजिए वैसे भी में बूढा हूँ आपकी सेवा नही कर पाता हूँ आपने इतने समय तक मुझे भोजन कराया है मेरा खयाल रखा है मैं आपके लिए सहर्ष अपने प्राण देने को तैयार हूँ  आप आज का भोजन मेरे ही माँस से कीजिये" ।
सियार फिर बोला - "आप तो बहुत बूढे हो चुके हो आपकी तो चमडी और माँस बहुत सख्त हो गया है महाराज पहले ही इतने घायल हैं आपको कैसे मार सकेंगे आपको बहुत यातना होगी और अगर जैसे तैसे आपके प्राण चले भी गए तो महाराज आपके माँस का एक निवाला भी नही चबा पायेंगे और आपका बलिदान व्यर्थ चला जायेगा" । इसलिए महाराज आप मुझे मार कर भोजन कर लीजिये ।
फिर एक क्षण रुका और इससे पहले कि कोई कुछ बोलता, सियार बोला - " किन्तु महाराज मेरे तो सारे शरीर में बहुत सारे बाल हैं, मैं एक सियार हूँ तो मेरा माँस भी बहुत बदबूदार होगा,मेरे अन्नदाता आप पहले ही इतने घायल और बीमार हो कहीं मेरे बदबूदार माँस खाने से आपकी हालत और नाजुक हो गयी और आपकी मृत्यु हो गयी तो । नही - नही मेरे मालिक मैं यह अन्याय नही कर सकता हूँ, मैं अपने महाराज की मृत्यु का कारण बन कर पाप का भागीदार नही बन सकता क्षमा करना महाराज मैं आपकी भूख नही मिटा पाया" । और यह कह कर सियार दुखी होने का नाटक कर के चुपचाप एक तरफ बैठ गया ।
Panchtantra ki kahaniyan in hindi
Panchtantra ki kahaniyan
       बेचारे सीधे - साधे कथनक ऊँट ने जब यह देखा कि सभी सेवक अपनी जान देने की विनती कर रहे हैं तो वह भी पीछे नही रहा । उनकी स्वामी भक्ति को देख कर उसका हृदय पसीज गया
उसने शेर को प्रणाम करके कहा, “स्वामी, ये सभी आपके लिए अभक्ष्य हैं । किसी का आकार छोटा है, किसी का माँस बूढा होने के कारण सख्त हो गया है, किसी की देह पर घने बाल हैं और माँस बदबूदार है, किन्तु मैं आकार में भी बडा हूँ, बूढा भी नही हूँ और में सियार नही हूँ तो मेरा माँस भी बदबूदार नही होगा  इसलिये आप मुझे मार कर मेरे माँस से अपनी भूख मिटाइये जिससे कि मुझे पुण्य की प्राप्ति हो सके” ।
कथनक का इतना कहना था कि बाघ और सियार उस पर झपट पडे और देखते ही देखते उसके पेट को चीरकर रख दिया । बस फिर क्या था, भूख से पीडित शेर और बाघ आदि ने तुरन्त ही उसको चट कर डाला ।

Moral of the story

शिक्षा -: "धूर्तों की संगत" कभी नही करनी चाहिये, किन्तु विवशता बस अगर धूर्तों के साथ रहना पडे तो पूरी तरह से सतर्क रहना चाहिये, उनकी मीठी बातों में तो बिलकुल नही आना चाहिये और विवेकहीन तथा मूर्ख स्वामी से भी दूर रहने में ही भलाई है ।
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