Friday, 14 February 2020

"ये भी सेवा है" Moral Story


जीवन में नैतिक ज्ञान ( Moral Education ) का क्या महत्व है यह एक सीखने का महत्वपूर्ण विषय है जीवन एक कभी न थमने वाली अविरल चलने वाली धारा की तरह है जो हर पल हर समय बस चलता ही रहता है जब तक कि मृत्यु की सच्चाई से सामना न हो जाय और जीवन की इस धारा में जो पहला महत्वपूर्ण नियम है वह है नैतिकता जो किसी भी व्यक्ति विशेष के जीवन को शिष्ठ बनाती है जीवन में दया, करुणा, प्रेम, सौहार्द भर देती है तो परिचित होते हैं एक ऐसी ही नैतिक कहानी ( Moral Story ) से जो बताती है कि नैतिकता इतनी सरल भी हो सकती है ।

"ये भी सेवा है" Best Moral Story in hindi

         मैं ऑफिस बस से ही आती जाती हूँ आप भी अक्सर बस में सफर करते होंगे शहरों में एक मिडिल क्लास व्यक्ति के लिए सस्ता और टिकाऊ परिवहन का साधन बस ही है। यह मेरी भी दिनचर्या का हिस्सा है । उस दिन भी बस स्टॉप पर खडे - खडे काफी वक्त हो गया था बस काफी देर से आई, लगभग आधे - पौन घंटे बाद । खडे - खडे पैर दुखने लगे थे । पर चलो शुक्र था कि बस मिल गई । देर से आने के कारण भी और पहले से ही बस में काफी भीड थी ।
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        खैर बस में चढ कर मैंनें चारों तरफ नजर दौडाई तो पाया कि सभी सीटें भर चुकी थी । उम्मीद की कोई किरण नजर नही आई । टिकट ले के मैं थोडा आगे बडी और एक पोल को पकड कर खडी हो गयी तभी एक औरत ने जिसके सामने मैं खडी थी अपनी सीट देते हुए कहा, "मैडम जी आप यहाँ बैठ जाइये " । मैंने उसे धन्यवाद देते हुए उस सीट पर बैठकर राहत को साँस ली । मुझे लगा कि मैंने उसे कहीं देखा है फिर याद आया वो महिला तो मेरे साथ बस स्टॉप पर खडी थी तब मैंने उस पर ध्यान नही दिया था ।
         कुछ देर बाद मेरे पास वाली सीट खाली हुई, तो मैंने उसे बैठने का इशारा किया । तब उसने अपने से पीछे खडी एक महिला को उस सीट पर बैठने को कहा जिसकी गोद में एक छोटा बच्चा था । वो बेचारी भीड की धक्का -मुक्की सहते हुए उस पोल को पकड कर खडी थी । कुछ  स्टॉप निकलने के बाद जब वह बच्चे वाली औरत अपने स्टॉप पर उतरने को उठी तो मैंने फिर उसे बैठने का इशारा किया और वह सीट पर बैठ गयी बस थोडा ही चली थी कि पीछे से एक बुजुर्ग आये और उस पोल के सहारे खडे हो गये।
          इस बार भी वह महिला सीट से उठी और उन बुजुर्ग को सीट पर बिठा कर खुद फिर उसी पोल के सहारे खडी हो गयी, मुझे आश्चर्य हुआ कि इतना लम्बा सफर, हम दिन -रात बस की सीट के लिये बेतहजीब धक्का - मुक्की कर के बस में चढते हैं अक्सर सीट के लिये लडते रहते हैं और ये किस मिट्टी की बनी है जो सीट मिलती है और दूसरे को दे देती है ।
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        कुछ देर बाद जब वो बुजुर्ग भी अपने स्टॉप पर उतर गए, तब वो फिर सीट पर बैठी । मुझसे रहा नही गया, तो उससे पूछ बैठी ।
 "तुम्हें थकान नही होती है क्या तुम्हें तो सीट मिल गई थी एक या दो बार नही, बल्कि तीन बार, फिर भी तुमने सीट औरों को दे दी ? तुम भी काम से लौट रही हो थकी हुई लग रही हो, आराम की जरूरत तो तुम्हें भी होगी, फिर क्यों नही बैठी ?
          मेरी इस बात का उसने जो जवाब दिया उसकी उम्मीद मैंने कभी नही की थी । उसने कहा, "मैं भी थकती हूँ मैडम जी । आप से पहले से स्टॉप पर खडी थी, मेरे भी पैरों में दर्द होने लगा था । जब मैं बस में चडी थी तब यही सीट खाली थी । मैंने देखा आपके पैरों में तकलीफ होने के कारण आप धीरे - धीरे बस में चडी । ऐसे में आप कैसे खडी रहती इसलिये मैंने आपको सीट दे दी । उस बच्चे वाली महिला को सीट इसलिये दी उसकी गोद में छोटा बच्चा था जो बहुत देर से रो रहा था । उसने सीट पर बैठते ही सुकून महसूस किया और वो बेचारे बुजुर्ग उनके खडे रहते मैं कैसे बैठती, सो उन्हें दे दी ।
मैंने कहा - " लेकिन तुम भी तो थकी हुई हो और तुम्हें भी आराम चाहिये होगा " ?
         आप लोगों को सीट पर बैठ कर सुकून मिला तो मुझे भी अन्दर से सुकून मिला मैडम जी । कुछ देर का सफर है मैडम जी, सीट के लिये क्या लडना । वैसे भी सीट को तो बस में ही छोड कर जाना है, घर तो नही ले जाना है ना । मैं ठहरी झाडू पोछा करने वाली, दिन भर लोगों के घरों में काम करती हूँ तब जा के घर चलता है, मेरे पास क्या है, न दान करने लायक धन है, न कोई पुण्य कमाने लायक करने को कुछ । इसलिए रास्ते से कचरा हटा देती हूँ, रास्ते के पत्थर बटोर देती हूँ, कभी कोई पौधा लगा देती हूँ । ऐसे ही जरूरत मंदों को बस में अपनी सीट दे देती हूँ । यही है मेरे पास, मुझे यही करना आता है , मैडम जी वो कहावत तो आपने सुनी ही होगी  "सेवा करोगे तो मेवा मिलेगा" । बस ऐसे ही छोटी - छोटी सेवा करके थोडा मैं भी पूण्य कमा लेती हूँ ।

सीख भले ही Moral story से मिले

         उसका स्टॉप आ गया, वो तो मुस्करा कर चली गई पर मुझे आत्ममंथन करने को मजबूर कर गई । मुझे उसकी बातों से एक सीख मिली कि हम बडा कुछ नही कर सकते  तो समाज में एक छोटा सा, नगण्य दिखने वाला कार्य तो कर ही सकते हैं । ये महिला उन लोगों के लिये सबक है जो आयकर बचाने के लिए अपनी काली कमाई को दान के नाम पर खपाते हैं, या फिर वो लोग जिनके पास पर्याप्त साधन होने के बाबजूद भी समाज की परवाह नही करते हैं, या वो लोग जो समाज में पसरे छोटी - छोटी बुराईयों को ठीक करने की बजाय यह कह देते हैं कि मुझे इससे क्या, या फिर वो लोग जो समाजसेवा के नाम पर बडी - बडी बातें करते हैं परन्तु इन छोटी - छोटी बातों पर कभी ध्यान नही देते ।

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 मैंने मन ही मन उस महिला को नमन किया तथा उससे सीख ली यदि हमें समाज के लिए कुछ करना हो, तो वह दिखावे के लिए न किया जाए बल्कि खुद की संतुष्टि के लिए हो ।

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