Saturday, 25 January 2020

"दूध का दाम" Munshi prem chand


           एक कवि और कवि द्वारा की गयी रचना के तौर पर Munshi Prem Chand जी ने अपनी रचनाओं में व्यापक और रचनात्मक रूप से समाज को अंकित किया है । समाज के अनेक अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डाला है । समाज के अन्दर रचे, बसे अच्छाइयों, बुराइयों को तरीके से सहेज कर कहानी  के रूप में प्रस्तुत किया है । उन्ही कहानियों  में से एक है "दूध का दाम"

Munshi Prem chand "दूध का दाम"


          बडे - बडे शहरों में दाइयाँ, नर्सें और लेडी डाक्टर, सभी पैदा हो गयी हैं, लेकिन देहातों में जच्चेखानों पर अभी तक भंगिनों का ही प्रभुत्व है । और निकट भविष्य में इसमें कोई तब्दीली होने की आशा भी नही । बाबू महेशनाथ अपने गाँव के जमींदार थे, शिक्षित थे और जच्चेखानों में सुधार की आवश्यकता को मानते थे, लेकिन इसमें जो बाधाएँ थी, उन पर कैसे विजय पाते ? कोई नर्स देहात में जाने पर राजी न हुई और बहुत कहने सुनने से राजी भी हुई, तो इतनी लम्बी चौडी फीस माँगी कि बाबू साहब को सिर झुकाकर चले आने के सिवा और कुछ न सूझा ।
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           लेडी डाक्टर के पास जाने की उन्हें हिम्मत न पडी । उसकी फीस पूरी करने के लिए तो शायद बाबू साहब को अपनी आधी जायदाद बेचनी पडती इसलिए जब तीन कन्याओं के बाद वह चौथा लडका पैदा हुआ, तो फिर वही गूदड था और वही गूदड की बहू ।
           बच्चे अक्सर रात ही को पैदा होते हैं । एक दिन आधी रात को चपरासी ने गूदड के द्वार पर ऐसी हाँक लगायी कि आस पडोस में भी जाग पड गयी । लडकी न थी कि मरी आवाज से पुकारता ।
         गूदड के घर में इस शुभ अवसर के लिए महीनों से तैयारी हो रही थी । भय था तो यही कि फिर बेटी न हो जाय, नही तो वही बँधा हुआ एक रुपया और एक साडी मिलकर रह जायगी । इस विषय में पति - पत्नी में कितनी ही बार झगडा हो चुका था, शर्त लग चुकी थी । स्त्री कहती थी, 'अगर अबकी बेटा न हो तो मुँह न दिखाऊँ, हाँ - हाँ, मुँह न दिखाऊँ, सारे लच्छन बेटे के हैं, और गूदड कहता था, 'देख लेना, बेटी होगी और बीच खेत बेटी होगी । बेटा निकले तो मूँछें मुँडा लूँ, हाँ - हाँ, मूँछें मुडा लूँ । 'शायद गूदड समझता था कि इस तरह अपनी स्त्री में पुत्र कामना को बलवान करके वह बेटे की अवाई के लिए रास्ता साफ कर रहा है ।
भूँगी बोली, 'अब मूँछ मुँडा ले दाढीजार ! कहती थी, बेटा होगा, सुनता ही न था । अपनी ही रट लगाये जाता था । मैं आज तेरी मूछें मूडूँगी, खूँटी तक तो रखूँगी ही नही' ।
गूदड ने कहा, 'अच्छा मूड लेना भलीमानस ! मूछें क्या फिर निकलेंगी ही नही ? तीसरे दिन देख लेना, फिर ज्यों की त्यों हैं, मगर जो कुछ मिलेगा, उसमें आधा रख लूँगा, कहे देता हूँ ।
भूँगी ने अँगूठा दिखाया और अपने तीन महीने के बालक को गूदड के सुपुर्द कर सिपाही के साथ चल खडी हुई ।
गूदड ने पुकारा, 'अरी ! सुन तो, कहाँ भागी जाती है ? मुझे भी बधाई बजाने जाना पडेगा । इसे कौन सँभालेगा' ?
भूँगी ने दूर से ही कहा, 'इसे वहीं धरती पर सुला देना । मैं आके दूध पिला जाऊँगी' ।
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         महेशनाथ के यहाँ अब भूँगी की खूब खातिरदारियाँ होने लगी । सबेरे हरीरा मिलता, दोपहर को पूरियाँ और हलवा, तीसरे पहर को फिर और रात को फिर और गूदड को भी भरपूर परोसा मिलता था । भूँगी अपने बच्चे को अपना दूध दिन - रात में एक दो बार से ज्यादा न पिला सकती थी। उसके लिए ऊपर के दूध का प्रबन्ध था । भूँगी का दूध बाबूसाहब का भाग्यवान बालक पीता था । और यह सिलसिला बारहवें दिन भी न बन्द हुआ । मालकिन मोटी - ताजी देवी थी, पर अबकी कुछ ऐसा संयोग कि उन्हें दूध हुआ ही नही ।
          तीनों लडकियों की बार इतने इफरात से दूध होता था कि लडकियों को बदहजमी हो जाती थी । अब की एक बूँद नही । भूँगी दाई भी थी और दूध पिलाई भी । मालकिन कहती 'भूँगी, हमारे बच्चे को पाल दे, फिर जब तक तू जिये, बैठी खाती रहना । पाँच बीघे माफी दिलवा दूँगी । नाती - पोते तक चैन करेंगे' और भूँगी का लाडला ऊपर का दूध हजम न कर सकने के कारण बार - बार उल्टी करता और दिन - दिन दुबला होता जाता था ।
भूँगी कहती, 'बहूजी, मूँडन में चूडे लूँगी, कहे देती हूँ' ।
बहूजी, उत्तर देती, 'हाँ - हाँ, चूडे लेना भाई, धमकाती क्यों है ? चाँदी के लेगी या सोने के' ।
'वाह बहूजी ! चाँदी के चूडे पहन के किसे मुँह दिखाऊँगी और किसकी हँसी होगी' ?
'अच्छा, सोने के लेना भाई, कह तो दिया' ।
'और ब्याह में कण्ठा लूँगी और चौधरी (गूदड) के लिए हाथों के तोडे' ।
'वह भी लेना, भगवान वह दिन तो दिखावे' ।
           घर में मालकिन के बाद भूँगी का राज था । महरियाँ, महराजिन, नौकर - चाकर सब उसका रोब मानते थे । यहाँ तक कि खुद बहूजी भी उससे दब जाती थी । एक बार तो उसने महेशनाथ को भी डाँटा था । हँसकर टाल गये । बात चली थी भंगियों की । महेशनाथ ने कहा था दुनिया में और चाहे जो कुछ हो जाय, भंगी - भंगी ही रहेंगे । इन्हें आदमी बनाना मुश्किल है । इस पर भूँगी ने कहा था मालिक, भंगी तो बडे - बडों को आदमी बनाते हैं, उन्हें कोई क्या आदमी बनायेगा । यह गुस्ताखी करके किसी दूसरे अवसर पर भला भूँगी के सिर के बाल बच सकते थे ? लेकिन आज बाबूसाहब ठठाकर हँसे और बोले भूँगी बात बडे पते की कहती है ।
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           भूँगी का शासनकाल साल भर से आगे न चल सका । देवताओं ने बालक के भंगिन का दूध पीने पर आपत्ति की, मोटेराम शास्त्री तो प्रायश्चित्त का प्रस्ताव कर बैठे । दूध तो छुडा दिया गया,  लेकिन प्रायश्चित्त की बात हँसी में उड गयी । महेशनाथ ने फटकारकर कहा, 'प्रायश्चित्त की खूब कही शास्त्रीजी, कल तक उसी भंगिन का खून पीकर पला, अब उसमें छूत घुस गयी । वाह रे आपका धर्म ।
          शास्त्रीजी शिखा फटकारकर बोले यह सत्य है, वह कल तक भंगिन का रक्त पीकर पला । माँस खाकर पला, यह भी सत्य है, लेकिन कल की बात कल थी, आज की बात आज । जगन्नाथपुरी में छूत अछूत सब एक पंगत में खाते हैं, पर यहाँ तो नही खा सकते । बीमारी में तो हम भी कपडे पहने खा लेते हैं, खिचडी तक खा लेते हैं बाबूजी, लेकिन अच्छे हो जाने पर तो नेम का पालन करना ही पडता है । आपतधर्म की बात न्यारी है ।
'तो इसका यह अर्थ है कि धर्म बदलता रहता है कभी कुछ, कभी कुछ' ?
'और क्या ! राजा का धर्म अलग, प्रजा का धर्म अलग, अमीर का धर्म अलग, गरीब का धर्म अलग, राजे -महाराजे जो चाहें खाये, जिसके साथ चाहे खाये,  जिसके साथ चाहें शादी ब्याह करें, उनके लिए कोई बन्धन नही । समर्थ पुरुष हैं । बन्धन तो मध्य वालों के लिए है' ।
        प्रायश्चित्त तो न हुआ, लेकिन भूँगी को गद्दी से उतरना पडा ! हाँ, दान दक्षिणा इतनी मिली की वह अकेले ले न जा सकी और सोने के चूडे भी मिले । एक की जगह दो नयी, सुन्दर साडियाँ मामूली नैनसुख की नही, जैसी लडकियों की बार मिली थी ।

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          इसी साल प्लेग ने जोर बाँधा और गूदड पहले ही चपेट में आ गया । भूँगी अकेली रह गयी, पर गृहस्थी ज्यों की त्यों चलती रही । लोग ताक लगाये बैठे थे कि भूँगी अब गयी । फलाँ भंगी से बातचीत हुई, फलाँ चौधरी आये, लेकिन भूँगी न कहीं आयी, न कहीं गयी, यहाँ तक कि पाँच साल बीत गये और उसका बालक मंगल, दुर्बल और सदा रोगी रहने पर भी, दौडने लगा । सुरेश के सामने पिद्दी सा लगता था ।
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          एक दिन भूँगी महेशनाथ के घर का परनाला साफ कर रही थी, महीनों से गलीज जमा हो रहा था । आँगन में पानी भरा रहने लगा था । परनाले में एक लम्बा मोटा बाँस डालकर जोर से हिला रही थी । पूरा दाहिना हाथ परनाले के अन्दर था कि एकाएक उसने चिल्लाकर हाथ बाहर निकाल लिया और उसी वक्त एक काला साँप परनाले से निकलकर भागा । लोगों ने दौडकर उसे मार तो डाला, लेकिन भूँगी को न बचा सके । समझे, पानी का साँप है, विषैला न होगा, इसलिए पहले कुछ गफलत की गयी, जब विष देह में फैल गया और लहरें आने लगी, तब पता चला कि वह पानी का साँप नही, गेहुँवन था ।
         मंगल अब अनाथ था । दिनभर महेशबाबू के द्वार पर मँडराया करता, घर में जूठन इतना बचता था कि ऐसे - ऐसे दस पाँच बालक पल सकते थे । खाने की कोई कमी न थी । हाँ, उसे तब बुरा जरूर लगता था, जब उसे मिट्टी के कसोरों में ऊपर से खाना दिया जाता था । सब लोग अच्छे - अच्छे बरतनों में खाते हैं, उसके लिए मिट्टी के कसोरे ! यों उसे इस भेदभाव का बिलकुल ज्ञान न होता था, लेकिन गाँव के लडके चिढा - चिढा कर उसका अपमान करते रहते थे । कोई उसे अपने साथ खेलाता भी न था । यहाँ तक कि जिस टाट पर वह सोता था, वह भी अछूत था ।
         मकान के सामने एक नीम का पेड था । इसी के नीचे मंगल का डेरा था । एक फटा सा टाट का टुकडा, दो मिट्टी के कसोरे और एक धोती, जो सुरेश बाबू की उतरन थी, जाडा, गरमी, बरसात हरेक मौसम में वह जगह एक सी आरामदेह थी और भाग्य का बली मंगल झुलसती हुई लू, गलते हुए जाडे और मूसलाधार वर्षा में भी जिन्दा और पहले से कही स्वस्थ था । बस, उसका कोई अपना था, तो गाँव का एक कुत्ता, जो अपने सहवर्गियों के जुल्म से दुखी होकर मंगल की शरण आ पडा था । दोनों एक ही खाना खाते, एक ही टाट पर सोते, तबियत भी दोनों की एक सी थी और दोनों एक दूसरे के स्वभाव को जान गये थे । कभी आपस में झगडा न होता ।
            गाँव के धार्मात्मा लोग बाबूसाहब की इस उदारता पर आश्चर्य करते । ठीक द्वार के सामने पचास हाथ भी न होगा मंगल का पडा रहना उन्हें सोलहों आने धर्म विरुद्ध जान पडता था । छि, छि: ! यही हाल रहा, तो थोडे ही दिनों में धर्म का अन्त ही समझो । भंगी को भी भगवान ने ही रचा है, यह हम भी जानते हैं । उसके साथ हमें किसी तरह का अन्याय न करना चाहिए, यह किसे नही मालूम ? भगवान का तो नाम ही पतित पावन है, लेकिन समाज की मर्यादा भी कोई वस्तु है । उस द्वार पर जाते हुए संकोच होता है । गाँव के मालिक हैं, जाना तो पडता ही है, लेकिन बस यही समझ लो कि घृणा होती है ।
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          मंगल और टामी में गहरी बनती थी । मंगल कहता देखो भाई टामी, जरा और खिसककर सोओ । आखिर मैं कहाँ लेटूँ ? सारा टाट तो तुमने घेर लिया । टामी कूँ - कूँ करता, दुम हिलाता और खिसक जाने के बदले और ऊपर चढ आता एवं मंगल का मुँह चाटने लगता । शाम को वह एक बार रोज अपना घर देखने और थोडी देर रोने जाता । पहले साल फूस का छप्पर गिर पडा, दूसरे साल एक दीवार गिरी और अब केवल आधी - आधी दीवारें खडी थी,  जिनका ऊपरी भाग नोकदार हो गया था । यही उसे स्नेह की सम्पत्ति मिली थी । वही स्मृति, वही आकर्षण, वही प्यार उसे एक बार उस ऊजड में खींच ले जाता था और टामी सदैव उसके साथ होता था । मंगल नोकदार दीवार पर बैठ जाता और जीवन के बीते और आनेवाले स्वप्न देखने लगता और बार - बार उछलकर उसकी गोद में बैठने की असफल चेष्टा करता ।
          एक दिन कई लडके खेल रहे थे, मंगल भी पहुँचकर दूर खडा हो गया । या तो सुरेश को उस पर दया आयी, या खेलनेवालों की जोडी पूरी न पडती थी, कह नही सकते । जो कुछ भी हो, तजवीज की कि आज मंगल को भी खेल में शरीक कर लिया जाय । यहाँ कौन देखने आता है ।
'क्यों रे मंगल, खेलेगा' ।
मंगल बोला, 'ना भैया, कहीं मालिक देख लें, तो मेरी चमडी उधेड दी जाय । तुम्हें क्या, तुम तो अलग हो जाओगे' ।
सुरेश ने कहा, 'तो यहाँ कौन आता है देखने बे ? चल, हम लोग सवार - सवार खेलेंगे, तू घोडा बनेगा, हम लोग तेरे ऊपर सवारी करके दौडायेंगे' ?
मंगल ने शंका की, 'मैं बार - बार घोडा ही रहूँगा, कि सवारी भी करूँगा ? यह बता दो' ।
यह प्रश्न टेढा था । किसी ने इस पर विचार न किया था । सुरेश ने एक क्षण विचार करके कहा, 'तुझे कौन अपनी पीठ पर बिठायेगा, सोच' ?
'आखिर तू भंगी है कि नही' ?
मंगल भी कडा हो गया । बोला, 'मैं कब कहता हूँ कि मैं भंगी नही हूँ, लेकिन तुम्हें मेरी ही माँ ने अपना दूध पिलाकर पाला है । जब तक मुझे भी सवारी करने को न मिलेगी, मैं घोडा न बनूँगा । तुम लोग बडे जाघड  हो । आप तो मजे से सवारी करोगे और मैं घोडा ही बना रहूँ' ।
सुरेश ने डाँटकर कहा, 'तुझे घोडा बनना पडेगा' और मंगल को पकडने दौडा । मंगल भागा, सुरेश ने दौडाया । मंगल ने कदम और तेज किया । सुरेश ने भी जोर लगाया, मगर वह बहुत खा खाकर थुल - थुल हो गया था । और दौडने में उसकी साँस फूलने लगती थी । आखिर उसने रुककर कहा, 'आकर घोडा बनो मंगल, नही तो कभी पा जाऊँगा, तो बुरी तरह पीटूँगा' ।
'तुम्हें भी घोडा बनना पडेगा' ।
'अच्छा हम भी बन जायँगे' ।
'तुम पीछे से निकल जाओगे । पहले तुम घोडा बन जाओ । मैं सवारी कर लूँ, फिर मैं बनूँगा' ।
सुरेश ने सचमुच चकमा देना चाहा था । मंगल का यह मुतालबा सुनकर साथियों से बोला, 'देखते हो इसकी बदमाशी, भंगी है न' ।
तीनों ने मंगल को घेर लिया और उसे जबरदस्ती घोडा  बना दिया । सुरेश ने चटपट उसकी पीठ पर आसन जमा लिया और टिकटिक करके बोला, 'चल घोडे चल' !

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         मंगल कुछ देर तक तो चला, लेकिन उस बोझ से उसकी कमर टूटी जाती थी । उसने धीरे से पीठ सिकोडी और सुरेश की रान के नीचे से सरक गया । सुरेश महोदय लद से गिर पडे और भोंपू बजाने लगे माँ ने सुना, सुरेश कहीं रो रहा है । सुरेश कहीं रोये, तो उनके तेज कानों में जरूर भनक पड जाती थी और उसका रोना भी बिलकुल निराला होता था, जैसे छोटी लाइन के इंजन की आवाज । महरी से बोली, 'देख तो, सुरेश कहीं रो रहा है, पूछ तो किसने मारा है' ।
          इतने में सुरेश खुद आँखें मलता हुआ आया । उसे जब रोने का अवसर मिलता था, तो माँ के पास फरियाद लेकर जरूर आता था । माँ मिठाई या मेवे देकर आँसू पोंछ देती थी । आप थे तो आठ साल के, मगर थे बिलकुल गावदी । हद से ज्यादा प्यार ने उसकी बुद्धि के साथ वही किया था, जो हद से ज्यादा भोजन ने उसकी देह के साथ ।
माँ ने पूछा, 'क्यों रोता है सुरेश, किसने मारा' ?
सुरेश ने रोकर कहा, 'मंगल ने छू दिया' ।
माँ को विश्वास न आया । मंगल इतना निरीह था कि उससे किसी तरह की शरारत की शंका न होती थी, लेकिन जब सुरेश कसमें खाने लगा, तो विश्वास करना लाजिम हो गया । मंगल को बुलाकर डाँटा, 'क्यों रे मंगल, अब तुझे बदमाशी सूझने लगी । मैंने तुझसे कहा था, सुरेश को कभी मत छूना, याद है कि नही, बोल' ।
मंगल ने दबी आवाज से कहा, 'याद क्यों नही है' ।
'तो फिर तूने उसे क्यों छुआ' ?
'मैंने नही छुआ' ।
'तूने नही छुआ, तो वह रोता क्यों था' ?
'गिर पडे, इसलिए रोने लगे' ।
चोरी और सीनाजोरी । देवी जी दाँत पीसकर रह गयी । मारती, तो उसी दम स्नान करना पडता । छडी तो हाथ में लेनी ही पडती और छूत का विद्युत प्रवाह इस छडी के रास्ते उनकी देह में प्रविष्ट हो जााता, इसलिए जहाँ तक गालियाँ दे सकी, दी और हुक्म दिया कि 'अभी के अभी यहाँ से निकल जा । फिर जो इस द्वार पर तेरी सूरत नजर आयी, तो खून ही पी जाऊँगी । मुफ्त की रोटियाँ खा खाकर शरारत सूझती है' आदि ।
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           मंगल में गैरत तो क्या थी, हाँ डर था । चुपके से अपने सकोरे उठाये, टाट का टुकडा बगल में दबाया, धोती कन्धो पर रखी और रोता हुआ वहाँ से चल पडा । अब वह यहाँ कभी न आयेगा । यही तो होगा कि भूखों मर जायेगा । क्या हरज है ? इस तरह जीने से फायदा ही क्या ? गाँव में उसके लिए और कहाँ ठिकाना था ? भंगी को कौन पनाह देता ? उसी खंडहर की ओर चला, जहाँ भले दिनों की स्मृतियाँ उसके आँसू पोंछ सकती थी और खूब फूट - फूटकर रोया । उसी क्षण टामी भी उसे ढूँडता हुआ पहुँचा और दोनों फिर अपनी व्यथा भूल गये ।
          ज्यों - ज्यों दिन का प्रकाश क्षीण होता जाता था, मंगल की ग्लानि भी क्षीण होती जाती थी । बचपन को बेचैन करने वाली भूख देह का रक्त पी पीकर और भी बलवान होती जाती थी । आँखें बार - बार कसोरों की ओर उठ जाती । वहाँ अब तक सुरेश की जूठी मिठाइयाँ मिल गयी होती । यहाँ क्या धूल फाँके ?
उसने टामी से सलाह की खाओगे क्या टामी ? मैं तो भूखा लेटा रहूँगा ।
टामी ने कूँ - कूँ करके शायद कहा, 'इस तरह का अपमान तो जिन्दगी भर सहना है, यों हिम्मत हारोगे, तो कैसे काम चलेगा ? मुझे देखो, कभी किसी ने डण्डा मारा, चिल्ला उठा, फिर जरा देर बाद दुम हिलाता हुआ उसके पास जा पहुँचा । हम तुम दोनों इसीलिए बने हैं भाई !
मंगल ने कहा, 'तो तुम जाओ, जो कुछ मिले खा लो, मेरी परवाह न करो' ।
टामी ने अपनी श्वान भाषा में कहा, 'अकेला नही जाता, तुम्हें साथ लेकर चलूँगा' ।
'मैं नही जाता' 
'तो मैं भी नही जाता' 
'भूखों मर जाओगे'
'तो क्या तुम जीते रहोगे' ?
'मेरा कौन बैठा है, जो रोयेगा' ?
'यहाँ भी वही हाल है भाई, क्वार में जिस कुतिया से प्रेम किया था, उसने बेवफाई की और अब कल्लू के साथ है । खैरियत यही हुई कि अपने बच्चे लेती गयी, नही तो मेरी जान गाढे में पड जाती । पाँच - पाँच बच्चों को
कौन पालता' ।
एक क्षण के बाद भूख ने एक दूसरी युक्ति सोच निकाली । 'मालकिन हमें खोज रही होगी, क्या टामी' ?
'और क्या ? बाबूजी और सुरेश खा चुके होंगे । कहार ने उनकी थाली से जूठन निकाल लिया होगा और हमें पुकार रहा होगा' ।
'बाबूजी और सुरेश दोनों की थालियों में घी खूब रहता है और वह मीठी - मीठी चीज हाँ मलाई' ।
'सब का सब घूरे पर डाल दिया जायगा' ।
'देखें, हमें खोजने कोई आता है' ?
'खोजने कौन आयेगा, क्या कोई पुरोहित हो ? एक बार 'मंगल - मंगल' होगा और बस, थाली परनाले में उँडेल दी जायेगी' ।
'अच्छा, तो चलो चलें । मगर मैं छिपा रहूँगा, अगर किसी ने मेरा नाम लेकर न पुकारा, तो मैं लौट आऊँगा । यह समझ लो' ।
            दोनों वहाँ से निकले और आकर महेशनाथ के द्वार पर अँधेरे में दबककर खडे हो गये, मगर टामी को सब्र कहाँ ? वह धीरे से अन्दर घुस गया । देखा, महेशनाथ और सुरेश थाली पर बैठ गये हैं । बरोठे में धीरे से बैठ गया, मगर डर रहा था कि कोई डण्डा न मार दे । नौकर में बातचीत हो रही थी । एक ने कहा, 'आज मँगलवा नही दिखायी देता । मालकिन ने डाँटा था, इसलिए भागा है सायद' ।
दूसरे ने जवाब दिया, 'अच्छा हुआ, निकाल दिया गया । सबेरे - सबेरे भंगी का मुँह देखना पडता था ।
मंगल और अँधेरे में खिसक गया । आशा गहरे जल में डूब गयी । महेशनाथ थाली से उठ गये नौकर हाथ धुला रहा है । अब हुक्का पीयेंगे और सोयेंगे । सुरेश अपनी माँ के पास बैठा कोई कहानी सुनता - सुनता सो जायगा ! गरीब मंगल की किसे चिन्ता है ? इतनी देर हो गयी, किसी ने भूल से भी न पुकारा ।

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          कुछ देर तक वह निराश सा वहाँ खडा रहा, फिर एक लम्बी साँस खींचकर जाना ही चाहता था कि कहार पत्तल में थाली का जूठन ले जाता नजर आया । मंगल अँधेरे से निकलकर प्रकाश में आ गया । अब मन को कैसे रोके ?
कहार ने कहा, 'अरे, तू यहाँ था ? हमने समझा कि कहीं चला गया । ले, खा ले, मैं फेंकने ले जा रहा था' ।
मंगल ने दीनता से कहा, 'मैं तो बडी देर से यहाँ खडा था' ।
'तो बोला, क्यों नही' ?
'मारे डर के'
'अच्छा, ले खा ले' 
उसने पत्तल को ऊपर उठाकर मंगल के फैले हुए हाथों में डाल दिया । मंगल ने उसकी ओर ऐसी आँखों से देखा, जिसमें दीन कृतज्ञता भरी हुई थी । टामी भी अन्दर से निकल आया था । दोनों वहीं नीम के नीचे पत्तल
में खाने लगे । मंगल ने एक हाथ से टामी का सिर सहलाकर कहा, 'देखा, पेट की आग ऐसी होती है ! यह लात की मारी हुई रोटियाँ भी न मिलती, तो क्या करते' ? टामी ने दुम हिला दी ।
'सुरेश को अम्माँ ने पाला था'
टामी ने फिर दुम हिलायी ।
'लोग कहते हैं, दूध का दाम कोई नहीं चुका सकता और मुझे दूध का यह दाम  मिल रहा है' ।
टामी ने फिर दुम हिलायी ।
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