Thursday, 23 January 2020

"ओहदे का नशा" Hindi kahani


          यह एक बेहतरीन hindi kahani दो अलग - अलग व्यक्तिव के व्यक्तियों का चित्रण करती है और यह प्रेरणा देती है कि व्यक्ति चाहे कोई भी हो, किसी भी जाति, धर्म, पन्थ, मजहब, क्लास या बैग्राउंड या देश हो या विदेश कहीं से भी हो उसके चरित्र की असली पहचान उसका व्यक्तित्व तय करता है और व्यक्तित्व का निर्माण मानसिकता से होता है।

Hindi kahani ओहदे का नशा


         सुबह – सुबह का समय था, सैनिकों की एक बटालियन अपने देश के बहुत महत्वपूर्ण सुरक्षा क्षेत्र में खुदाई कर रही थी । उनका कमाँडिंग अफसर जोर - जोर से चिल्ला रहा था, गालियाँ दे रहा था, और अपनी बन्दूक से बीच - बीच में हवाई फायर कर रहा था “जल्दी करो ! तेजी से हाथ चलाओ, कामचोर हो गए हो तुम, बहुत आलसी हो गए हो, निकम्मो अगर दो घंटे में काम पूरा नही हुआ, तो तुम सबकी खैर नही”…..।
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           सैनिक पूरी मेहनत से काम कर रहे थे, किन्तु अफसर की डाँट और चिल्लाना रुक नही रहा था । तभी एक आर्मी की जीप जो वहाँ से गुजर रही थी, अफसर को बेवजह चिल्लाते देख, रुक गयी । उसमें से एक अधेड उम्र का व्यक्ति नीचे उतरा वह साधारण कपडों में था उसने बर्दी नही पहनी हुई थी । और अफसर से बोला– ‘ सर ये लोग तो बडी मेहनत से काम कर रहे हैं, आप काम में इनका हाथ बटाने की बजाय इन पर चिल्ला रहे हो, बुरा भला कह रहे हो अगर आप भी इनका हाथ बटाते, इनकी मदद करते तो काम और भी जल्दी हो सकता है’ ।
        पहले तो अफसर ने हैरानी से उस व्यक्ति की ओर देखा और एक पल के बाद बोला…
अफसर – मैं ? मैं करूँगा काम ? जानते भी हो मैं कौन हूँ ?
व्यक्ति – नही सर मैं आपको नही जानता हूँ किन्तु…..
( अफसर बीच में बोला )
अफसर - मैं इन सबका कमाँडिंग अफसर हूँ । और मेरा काम "काम करना नही इनसे काम करवाना है…. इनको ऑडर देना है", अगर तुम्हें मदद करने की ज्यादा ही उत्सुकता है, तो क्यों न तुम ही इनकी मदद कर दो ! किसने रोका है तुम्हें ।
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         ठीक है सर ! यह कह के वह व्यक्ति भी सैनिकों के साथ काम करने लगा । यह देख अफसर को थोडी हैरानी हुई और अब उसने चिल्लाना भी बंद कर दिया था, वह व्यक्ति पूरी मेहनत से सैनिकों के साथ काम में जुट गया और जब तक कार्य पूरा नही हुआ तब तक खुदाई करता रहा । 
           कोई दो घंटे की कडी मेहनत के बाद खुदाई का कार्य समाप्त हुआ और कार्य समाप्त होने के बाद उस व्यक्ति ने सभी सैनिकों से हाथ मिलाया और उनकी खूब प्रशंसा की । ‘आप सब लोग बहुत मेहनती हो और आप पर देश को नाज है मैं बहुत खुश हूँ कि आप जैसे लोग सेना में हैं और ओ भी हमारी कोर कमाँड में ।
        उत्सुकता में सैनिकों ने उनका परिचय और काम में मदद करने का कारण पूछा, जब उस व्यक्ति ने अपना परिचय दिया तो सैनिकों की खुशी का ठिकाना न रहा, उनका मनोबल सातवें आसमान पर पहुँच गया । उन्होंने पूरे सम्मान से उन्हें सल्यूट किया और उनके व्यवहार की प्रशंसा करते हुए गर्मजोसी से तालिया बजा कर उनका स्वागत किया ।
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           वह व्यक्ति अफसर के पास गया । और बोला “अगली बार जब तुम्हारा ओहदा तुम्हें मदद करने से रोके, तो मुझे बता देना । मैं तुम्हें हल सुझा दूँगा” ।

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         बटालियन  अफसर के होश उड गए, क्योंकि वह व्यक्ति कोई और नही अपने ओहदे का कोई अहंकार न करते हुए , विनम्रता का परिचय देने वाले यह व्यक्ति उस वक्त के कोर कमाँडिंग ऑफिसर और बाद में अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति ‘जॉर्ज वाँशिंगटन' थे।

शिक्षा – अहंकार चाहे किसी भी बात का हो ( पद, प्रतिष्ठा या अन्य किसी चीज का ) मनुष्य को हीन और निर्दयी बना देता है, अहंकारी मनुष्य का कोई भी मन से सम्मान नही करता । जबकि जो व्यक्ति अहंकार नही करता है उसका आदर सब मन से करते हैं।

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