Wednesday, 29 January 2020

"तीन कंजूस" hindi kahaniya


ज्ञान वर्धन और समय के सदुपयोग के साथ - साथ hindi kahaniya मनोरंजन और मन को प्रसन्न रखने का भी उत्तम साधन होती हैं । कहानी समाज के हर पहलू का आकलन करना सिखाती है एक प्रकार से कहा जाय तो मन को समाज के साथ न्याय करना सिखाती है अक्सर कहानीयाँ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से समाज का ही चरित्र  होती हैं बस यह समय और परिस्थिति पर निर्भर करता है कि कहानी किस पहलू को रेखाँकित कर रही है समाज के इसी कडी में से यह "तीन कंजूसों " की hindi kahani प्रस्तुत है ।

Hindi kahaniya "तीन कंजूस"

एक बार की बात है एक किसानों का गाँव था  । बहुत ही खुशहाल और सम्पन लोगों का गाँव । उनकी खुशहाली और सम्पनता की वजह थी उनकी जमीन । वहाँ की जमीन बहुत उपजाऊ थी और हर किसान के पास परिवार की आजीविका से ज्यादा जमीन थी ।
गाँव के पास ही एक नदी बहती थी । नदी का पानी नहर के द्वारा खेतों में आसानी से आ जाता  था जिससे वहाँ की भूमि पर बहुत सारा अनाज और साग - सब्जीयाँ उगती थी  फलदार पेडों की भी कमी नही थी । गाँव के लोग अपनी जमीन पर खूब अनाज और सब्जियाँ उगाते और अपनी जरूरत के अनुसार रखने के बाद जो अनाज और सब्जियाँ  बचती उसे बाजार में बेच देते जिससे उनके पास धन की भी कोई कमी न थी । 
Hindi kahaniya "तीन कंजूस", kahaniya
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गाँव में तीन कंजूस भी रहते थे तीनों का परिवार भी था बाल बच्चे भी थे तीनों के पास खेती की अच्छी खासी जमीन भी थी जिसमें और किसानों की ही तरह बहुत सारा अनाज और सब्जियाँ उगती थी । उनके पास भी अनाज और सब्जियाँ बेच के बहुत सारा धन था किन्तु खर्चा करने का तो वो नाम भी नही लेते थे ।
गाँव में सब लोग जानते थे कि तीनों महा कंजूस हैं इतने कंजूस की अनाज बेचने भी बाजार नही जाते थे कि कहीं बाजार जा के कुछ खर्चा न हो जाय कुछ दुकानदार गाँव में ही आ के अनाज खरीद ले जाते थे बस उन्हीं को अपना अनाज वगैरह बेच देते थे । इसलिये तीनों अलग ही रहते थे और लोग भी उनसे दूर - दूर ही रहते थे । लोग उन्हें कंजूस - कंजूस कह के चिढाया भी करते थे किन्तु तीनों महाशय थे कि किसी की परवाह ही न करते थे ।
एक दिन तीनों कंजूस आपस में बातें कर रहे थे अचानक से जाने क्या चमत्कार हुआ तीनों ने  बाजार जा के कुछ खरीदने का फैसला किया ।
पहला कंजूस बोला - हमें लोग कंजूस - कंजूस कह के चिढाते हैं ऐसा करते हैं बाजार जा के कुछ खरीद लाते हैं और लोगों को दिखा देते हैं कि हम कंजूस नही हैं । बस हम फिजूलखर्ची नही करते हैं ।
Hindi kahaniya "तीन कंजूस", kahaniya
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दूसरा कंजूस बोला - आपने पते की बात की है लोगों का मुँह बंद करने का यही एक तरीका है ।
तीसरा कंजूस बोला - हाँ सही है कुछ खरीद लाते हैं जो बहुत दिनों तक भी चल जाय और ज्यादा महंगा भी न हो ।
आखिरकार तीनों ने फैसला किया कि आज ही बाजार जा के कुछ खरीद लाते हैं और तीनों बाजार चले गए । बाजार की चहल - पहल से उनकी आँखें चौंधिया गयी कंजूस थे कभी बाजार तो जाते न थे बाजार के जरूरत की चीजों से या तो परहेज कर लेते या अति आवश्यक चीजें थोडे से पैसे देके घर वालों को भेज के मंगा लेते ।
तीनों ने बाजार के कही चक्कर लगाए, कही दुकानों पर जा - जा के मोलभाव किया । बहुत छानबीन और मोलभाव करने के बाद तीनों ने फैसला किया कि घी खरीद लेते हैं घी खायेंगे तो सेहत भी बनेगी और लोग भी कंजूस बोलना बन्द कर देंगे । तीनों ढाई - ढाई सौ ग्राम की एक - एक शीशी घी खरीद के वापस घर आ गए ।

Best part of story

महीना भर बीत गया एक दिन खेत से लौटते हुए तीनों रास्ते में मिल गए हाल चाल पूछने की बजाय आपस में घी की बात करने लगे । किसका कितना घी खर्च हुआ इस पर चर्चा होने लगी ।
Hindi kahaniya "तीन कंजूस", kahaniya
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पहला कंजूस बोला - भाई हम तो रोज घी में चुपडी हुई रोटियाँ खाते हैं पर मेरा घी तो अभी जैसे का तैसा है बस जरा सा खर्च हुआ है ।
दूसरा कंजूस बोला - कैसे भाई कैसे खाते हो ।
पहला कंजूस बोला - भाई जब रोटियाँ बनती हैं खाने के लिए बैठने से पहले मैं सबसे ऊपर की और सबसे नीचे की रोटी पर घी लगा देता हूँ बस ! और बाकी की रोटियाँ घी लगी हुई समझ के खा लेता हूँ आहा क्या स्वाद आता है रोटी खाने में ।
दूसरा कंजूस बोला - बाप रे बाप इतना ज्यादा खर्च ।
पहला कंजूस बोला - क्यों भाई तुम कैसे खाते हो ?
दूसरा कंजूस बोला - भाई में तो जब सारी रोटियाँ बन जाती हैं तो सारी रोटियों को एक के ऊपर एक लाइन में रख के एक लंबी सुई को घी में डुबो के रोटियों के बीचों बीच चुभो देता हूँ सारी रोटियों पर घी लग जाता है सुई निकाल के अलग रख दी और फिर आनन्द से खाता हूँ । मेरा घी तो बस नाम का ही खर्च हुआ है ।
तीसरा कंजूस बोला - हद करते हो भाई तुम दोनों तो बहुत ही ज्यादा खर्चीले हो ।
पहला कंजूस बोला - क्यों भाई तुम नही खाते हो क्या घी ?
तीसरा कंजूस बोला - क्यों नही ! मैं तो रोज खाता हूँ पर मेरा घी तो जितना लिया था अब भी उतना ही है ।
पहला कंजूस बोला - हमें भी तो बताओ तुम कैसे खाते हो जो जरा भी खर्च नही हुआ अब तक ।
तीसरा कंजूस बोला - भाई मैं तो सारी रोटियाँ बनने के बाद हर एक रोटी पर घी की शीशी मल देता हूँ और फिर शीशी का ढक्कन खोल के रोटी खाने बैठ जाता हूँ आहा क्या खुशबू आती है और मैं रोटियों को घी लगा हुआ समझ के खा लेता हूँ । एक बूँद भी घी खर्च नही होता है और खाने में भी आनन्द आ जाता है ।

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दोनों कंजूस बोले - वाह मानना पडेगा भाई तुमने सही कहा हम बहुत खर्चीले हैं । आज से हम भी ऐसे ही घी का इस्तेमाल करेंगे ताकी "हींग लगे न फिटकरी और रंग निकले चोखा" यानी कि खाने में भी आनन्द आ जाय और घी की एक बूँद भी खर्च न हो ।
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