Tuesday, 21 January 2020

चुहिया का स्वयंवर


          Panchatantra ki kahaniyon में चुहिया का स्वयंवर एक प्रशिद्ध कहानी हैै । गंगा नदी के किनारे एक तपस्वियों का आश्रम था । वहाँ याज्ञवल्क्य नाम के मुनि रहते थे । मुनिवर एक दिन नदी के किनारे जल लेकर आचमन कर रहे थे कि पानी से भरी हथेली में ऊपर से एक चुहिया गिर गई । उस चुहिया को आकाश में बाज लिये जा रहा था । उसके पंजे से छूटकर वह नीचे गिर गई । मुनि ने उसे पीपल के पत्ते पर रखा और फिर गंगाजल में स्नान किया । 
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         चुहिया में अभी प्राण शेष थे । मुनि उसे अपने आश्रम में लाये  और मुनि ने अपने प्रताप से उसे कन्या का रुप दे दिया । अपनी पत्‍नी को कन्या अर्पित करते हुए मुनि ने कहा कि इसे अपनी ही लडकी की तरह पालना । उनकी अपनी कोई सन्तान नही थी , इसलिये मुनि पत्‍नी ने उसका लालन, पालन बडे प्रेम से किया । १४ वर्ष तक वह उनके आश्रम में पलती रही ।
         जब वह विवाह योग्य अवस्था की हो गई तो पत्‍नी ने मुनि से कहा- "नाथ ! अपनी कन्या अब विवाह योग्य हो गई है । इसके विवाह का प्रबन्ध कीजिये" ।
मुनि ने कहा- "मैं अभी आदित्य को बुलाकर इसे उसके हाथ सौंप देता हूँ । यदि इसे स्वीकार होगा तो उसके साथ विवाह कर लेगी, अन्यथा नही" ।

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मुनि ने सूर्य देव को बुलाया और बालिका से पूछा "क्या तुम्हें सूर्य देव स्वीकार हैं" ?
पुत्री ने उत्तर दिया- "तात ! यह तो आग जैसा गरम है, मुझे स्वीकार नही । इससे अच्छा कोई वर बुलाइये" ।
मुनि ने सूर्य से पूछा कि वह अपने से अच्छा कोई वर बतलाये ।
सूर्य ने कहा- "मुझ से अच्छे मेघ हैं, जो मुझे ढककर छिपा लेते हैं" ।
मुनि ने मेघ को बुलाकर पूछा- "क्या यह तुम्हें स्वीकार है" ?
कन्या ने कहा- "यह तो बहुत काला है । इससे भी अच्छे किसी वर को बुलाओ" ।
मुनि ने मेघ से भी पूछा कि उससे अच्छा कौन है ।
मेघ ने कहा, "हम से अच्छी वायु है, जो हमें उडाकर दिशा, दिशाओं में ले जाती है" ।
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मुनि ने वायु को बुलाया और कन्या से स्वीकृति पूछी । कन्या ने कहा- "तात ! यह तो बडी चंचल है । इससे भी किसी अच्छे वर को बुलाओ" ।
मुनि ने वायु से भी पूछा कि उस से अच्छा कौन है । वायु ने कहा, "मुझ से अच्छा पर्वत है, जो बडी से बडी आँधी में भी स्थिर रहता है" ।
मुनि ने पर्वत को बुलाया और कन्या से पूछा तो कन्या ने कहा- "तात ! यह तो बडा कठोर और गंभीर है, इससे अधिक अच्छा कोई वर बुलाओ" ।
मुनि ने पर्वत से कहा कि वह अपने से अच्छा कोई वर सुझाये । तब पर्वत ने कहा- "मुझ से अच्छा चूहा है, जो मुझे तोडकर अपना बिल बना लेता है" ।

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मुनि ने तब चूहे को बुलाया और कन्या से कहा- "पुत्री ! यह मूषकराज तुझे स्वीकार हो तो इससे विवाह कर ले" ।
मुनिकन्या ने मूसकराज को बडे ध्यान से देखा । उसके साथ उसे विलक्षण अपनापन अनुभव हो रहा था । प्रथम दृष्टि में ही वह उस पर मुग्ध हो गई और बोली- "मुझे मूसिका बनाकर मूसकराज के हाथ सौंप दीजिये" ।
मुनि ने अपने तपोबल से उसे फिर चुहिया बना दिया और चूहे के साथ उसका विवाह कर दिया ।
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