Sunday, 1 December 2019

Hindi Kahaniya "दो बैलों की कथा"

 मुंशी प्रेमचंद ( 31 जुलाई 1880 से 8 अक्टूबर 1936 )

मुंशी प्रेमचंद  का जन्म वाराणसी ( बनारस ) के पास लमही नामक गाँव में हुआ था। उनका असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव था । 1898 में हाईस्कूल की परीक्षा पास करने के बाद वह एक स्थानीय पाठशाला में अध्यापक के पद पर कार्यरत हुए । बाद में उन्होंने 1910 में इंटर तथा 1919 में बी.ए. की परीक्षाएं पास की।
अपने जीवन काल में उन्होंने एक कवि के रूप में अनेक उपन्यासों - गोदान, गबन, सेवासदन, निर्मला, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, प्रतिज्ञा, वरदान आदि । तथा (hindi kahaniyanकहानियों - कफ़न, गरीब की हाय, पाँच फूल, नमक का दरोग़ा, हार की जीत , प्रेम पचीसी, प्रेम तीर्थ, सप्त सुमन, सोजे वतन, दो बैलों की कथा, पूस की रात आदि अनेक रचनायें की ।

                        दो बैलों की कथा

झूरी के पास दो बैल थे - हीरा और मोती । देखने में सुन्दर, काम में चौकस, डील  में ऊँचे, बहुत दिनों साथ रहते - रहते दोनों में भाईचारा हो गया था । दोनों आमने सामने या आस पास बैठे हुए एक, दूसरे से मूक भाषा में विचार, विनिमय किया करते थे । एक दूसरे के मन की बात को कैसे समझा जाता है, हम कह नही सकते । अवश्य ही उनमें कोई ऐसी गुप्त शक्ति थी, जिससे जीवों में श्रेष्ठता का दावा करने वाला मनुष्य वंचित है । दोनों एक, दूसरे को चाटकर सूँघकर अपना प्रेम प्रकट करते, कभी - कभी दोनों सींघ भी मिला लिया करते थे, विग्रह के नाते से नही, केवल विनोद के भाव से, आत्मीयता के भाव से,  जैसे दोनों में घनिष्ठता होते ही धौल धप्पा होने लगता है । इसके बिना दोस्ती कुछ फुसफसी, कुछ हल्की सी रहती है, फिर ज्यादा विश्वास नही किया जा सकता । जिस वक्त ये दोनों बैल हल या गाडी में जोत दिए जाते और गरदन हिला हिलाकर चलते, उस समय हर एक की चेष्टा होती कि ज्यादा से ज्यादा बोझ मेरी ही गर्दन पर रहे ।
दिनभर के बाद दोपहर या संध्या को दोनों खुलते तो एक दूसरे को चाट चूट कर अपनी थकान मिटा लिया करते, नाँद में खली भूसा पड जाने के बाद दोनों साथ उठते, साथ नाँद में मुँह डालते और साथ ही बैठते थे । एक मुँह हटा लेता तो दूसरा भी हटा लेता था ।

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 संयोग की बात, झूरी ने एक बार गोई को ससुराल भेज दिया । बैलों को क्या मालूम, वे कहाँ भेजे जा रहे हैं। समझे, मालिक ने हमें बेच दिया । अपना यों बेचा जाना उन्हें अच्छा लगा या बुरा, कौन जाने, पर झूरी के साले गया को घर तक गोई ले जाने में दाँतों पसीना आ गया । पीछे से हाँकता तो दोनों दायें बायें भागते, पगहिया पकडकर आगे से खींचता तो दोनों पीछे की ओर जोर लगाते, मारता तो दोनों सींगे नीची करके हूँकारते, अगर ईश्वर ने उन्हें वाणी दी होती तो झूरी से पूछते, तुम हम गरीबों को क्यों निकाल रहे हो ?
हमने तो तुम्हारी सेवा करने में कोई कसर नही उठा रखी । अगर इतनी मेहनत से काम न चलता था, तो और काम ले लेते । हमें तो तुम्हारी चाकरी में मर जाना कबूल था । हमने कभी दाने - चारे की शिकायत नही की, तुमने जो कुछ खिलाया, वह सिर झुकाकर खा लिया, फिर तुमने हमें इस जालिम के हाथ क्यों बेच दिया ?
संध्या समय दोनों बैल अपने नए स्थान पर पहुँचे । दिनभर के भूखे थे, लेकिन जब नाँद में लगाए गए तो एक ने भी उसमें मुँह नही डाला । दिल भारी हो रहा था । जिसे उन्होंने अपना घर समझ रखा था, वह आज उनसे छूट गया । यह नया घर, नया गाँव, नए आदमी उन्हें बेगाने से लगते थे ।
दोनों ने अपनी मूक भाषा में सलाह की, एक दूसरे को कनखियों से देखा और लेट गये । जब गाँव में सोता पड गया तो दोनों ने जोर मारकर पगहा तुडा डाले और घर की तरफ चले । पगहे बहुत मजबूत थे । अनुमान न हो सकता था कि कोई बैल उन्हें तोड सकेगा, पर इन दोनों में इस समय दूनी शक्ति आ गई थी । एक - एक झटके में रस्सियाँ टूट गई ।
झूरी प्रातः काल सो कर उठा तो देखा कि दोनों बैल चरनी पर खडे हैं । दोनों की गरदनों में आधा - आधा गराँव लटक रहा था । घुटने तक पाँव कीचड से भरे हैं और दोनों की आँखों में विद्रोहमय स्नेह झलक रहा है ।

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झूरी बैलों को देखकर स्नेह से गद्गद  हो गया । दौडकर उन्हें गले लगा लिया । प्रेमालिंगन और चुम्बन का वह दृश्य बडा ही मनोहर था ।
घर और गाँव के लडके जमा हो गए । और तालियाँ बजा बजाकर उनका स्वागत करने लगे । गाँव के इतिहास में यह घटना अभूतपूर्व न होने पर भी महत्त्वपूर्ण थी, बाल सभा ने निश्चय किया, दोनों पशु वीरों को अभिनन्दन पत्र देना चाहिए । कोई अपने घर से रोटियां लाया, कोई गुड, कोई चोकर, तो कोई भूसी ।
एक बालक ने कहा- ''ऐसे बैल किसी के पास न होंगे" ।
दूसरे ने समर्थन किया- ''इतनी दूर से दोनों अकेले चले आए" ।
तीसरा बोला- 'बैल नही हैं वे, उस जन्म के आदमी हैं' ।
इसका प्रतिवाद करने का किसी को साहस नही हुआ । झूरी की स्त्री ने बैलों को द्वार पर देखा तो जल उठी । बोली - 'कैसे नमक हराम बैल हैं कि एक दिन वहाँ काम न किया, भाग खडे हुए' ।
झूरी अपने बैलों पर यह आक्षेप न सुन सका- 'नमक हराम क्यों हैं ? चारा दाना न दिया होगा तो क्या करते ' ?
स्त्री ने रोब के साथ कहा- 'बस, तुम्हीं तो बैलों को खिलाना जानते हो, और तो सभी पानी पिलाकर रखते हैं' ।
झूरी ने चिढ़ाया- 'चारा मिलता तो क्यों भागते' ?
स्त्री चिढ़ गयी- 'भागे इसलिए कि वे लोग तुम जैसे बुद्धुओं की तरह बैल को सहलाते नही, खिलाते हैं तो रगडकर जोतते भी हैं । ये दोनों ठहरे कामचोर, भाग निकले । अब देखूँ कहाँ से खली और चोकर मिलता है । सूखे भूसे के सिवा कुछ न दूँगी, खायें चाहे मरें' ।
वही हुआ, मजूर की बडी ताकीद की गई कि बैलों को खाली सूखा भूसा दिया जाए । बैलों ने नाँद में मुँह डाला तो फीका - फीका, न कोई चिकनाहट, न कोई रस ! क्या खायें ? आशा भरी आँखों से द्वार की ओर ताकने लगे । झूरी ने मजूर से कहा- 'थोडी सी खली क्यों नही डाल देता बे' ?
'मालकिन मुझे मार ही डालेंगी' ।
'चुराकर डाल आ' ।
'ना दादा, पीछे से तुम भी उन्हीं की-सी कहोगे' ।
दूसरे दिन झूरी का साला फिर आया और बैलों को ले चला । अबकी उसने दोनों को गाडी में जोता, दो चार बार मोती ने गाडी को खाई में गिराना चाहा, पर हीरा ने संभाल लिया । वह ज्यादा सहनशील था ।
संध्या समय घर पहुंचकर उसने दोनों को मोटी रस्सियों से बाँधा और कल की शरारत का मजा चखाया फिर वही सूखा भूसा डाल दिया । अपने दोनों बैलों को खली चूनी सब कुछ दी । दोनों बैलों का ऐसा अपमान कभी न हुआ था । झूरी तो इन्हें फूल की छडी से भी न छूता था । उसकी टिटकार पर दोनों उडने लगते थे । यहाँ मार पडी । आहत सम्मान की व्यथा तो थी ही, उस पर मिला सूखा भूसा ! नाँद की तरफ आँखें तक न उठाई ।
दूसरे दिन गया ने बैलों को हल में जोता, पर इन दोनों ने जैसे पांव न उठाने की कसम खा ली थी । वह मारते - मारते थक गया, पर दोनों ने पांव न उठाया । एक बार जब उस निर्दयी ने हीरा की नाक पर खूब डंडे जमाये तो मोती को गुस्सा काबू से बाहर हो गया । हल लेकर भागा । हल, रस्सी, जुआ, जोत, सब टूट टाटकर बराबर हो गया । गले में बडी - बडी रस्सियाँ न होती तो दोनों पकड़ाई में न आते ।
हीरा ने मूक भाषा में कहा 'भागना व्यर्थ है' ।
मोती ने उत्तर दिया- 'तुम्हारी तो इसने जान ही ले ली थी' ।
'अबकी बडी मार पडेगी' ।
'पडने दो, बैल का जन्म लिया है तो मार से कहाँ तक बचेंगे' ?
'गया दो आदमियों के साथ दौडा आ रहा है, दोनों के हाथों में लाठियाँ हैं' ।
मोती बोला- 'कहो तो दिखा दूँ मजा मैं भी, लाठी लेकर आ रहा है' ।
हीरा ने समझाया- 'नही भाई ! खडे हो जाओ' ।
'मुझे मारेगा तो मैं एक दो को गिरा दूँगा' ।
'नही हमारी जाति का यह धर्म नही है' ।
मोती दिल में ऐंठकर रह गया । गया आ पहुँचा और दोनों को पकड कर ले चला । कुशल हुई कि उसने इस वक्त मारपीट न की, नही तो मोती पलट पडता । उसके तेवर देख गया और उसके सहायक समझ गए कि इस वक्त टाल जाना ही भलमनसाहत है । आज दोनों के सामने फिर वही सूखा भूसा लाया गया, दोनों चुपचाप खडे रहे ।
घर में लोग भोजन करने लगे । उस वक्त एक छोटी सी लडकी दो रोटियाँ लिए निकली और दोनों के मुँह में देकर चली गई । उस एक रोटी से इनकी भूख तो क्या शान्त होती, पर दोनों के हृदय को मानो भोजन मिल गया । यहाँ भी किसी सज्जन का वास है । लडकी भैरो की थी । उसकी माँ मर चुकी थी । सौतेली माँ उसे मारती रहती थी, इसलिए इन बैलों से एक प्रकार की आत्मीयता हो गई थी ।
दोनों दिनभर जोते जाते, डंडे खाते, अडते, शाम को थान पर बाँध दिए जाते और रात को वही बालिका उन्हें दो रोटियाँ खिला जाती । प्रेम के इस प्रसाद की यह बरकत थी कि दो - दो गाल सूखा भूसा खाकर भी दोनों दुर्बल न होते थे, मगर दोनों की आँखों में रोम - रोम में विद्रोह भरा हुआ था ।
एक दिन मोती ने मूक भाषा में कहा- 'अब तो नही सहा जाता हीरा' !
'क्या करना चाहते हो' ?
'एकाध को सींगों पर उठाकर फेंक दूँगा' ।
'लेकिन जानते हो, वह प्यारी लडकी, जो हमें रोटियाँ खिलाती है, उसी की लडकी है, जो इस घर का मालिक है, यह बेचारी अनाथ हो जाएगी' ।
'तो मालकिन को फेंक दूँ, वही तो इस लडकी को मारती है।
'लेकिन औरत जात पर सींग चलाना मना है, यह भूल जाते हो' ।
'तुम तो किसी तरह निकलने ही नही देते, बताओ, तुडाकर भाग चलें' ।
'हाँ, यह मैं स्वीकार करता, लेकिन इतनी मोटी रस्सी टूटेगी कैसे' ?
इसका एक उपाय है, पहले रस्सी को थोडा चबा लो, फिर एक झटके में जाती है ।
रात को जब बालिका रोटियाँ खिला कर चली गई तो दोनों रस्सियाँ चबाने लगे, पर मोटी रस्सी मुँह में न आती थी । बेचारे बार - बार जोर लगाकर रह जाते थे ।
सहसा घर का द्वार खुला और वह लडकी निकली । दोनों सिर झुकाकर उसका हाथ चाटने लगे । दोनों की पूंछें खडी हो गई । उसने उनके माथे सहलाए और बोली- 'खोल देती हूँ, चुपके से भाग जाओ, नही तो ये लोग मार डालेंगे । आज घर में सलाह हो रही है कि इनकी नाकों में नाथ डाल दी जाय'। उसने गराँव खोल दिया, पर दोनों चुप खडे रहे ।
मोती ने अपनी भाषा में पूछा- 'अब चलते क्यों नही' ?
हीरा ने कहा- 'चलें तो, लेकिन कल इस अनाथ पर आफत आएगी, सब इसी पर संदेह करेंगे' ।
सहसा बालिका चिल्लाई- 'फूफा वाले दोनों बैल भागे जा रहे हैं, ओ दादा! दादा! दोनों बैल भागे जा रहे हैं, जल्दी दौडो ।
गया हडबडाकर भीतर से निकला और बैलों को पकडने चला । वे दोनों भागे । गया ने पीछा किया, और भी तेज हुए, गया ने शोर मचाया । फिर गाँव के कुछ आदमियों को भी साथ लेने के लिए लौटा । दोनों मित्रों को भागने का मौका मिल गया । सीधे दौडते चले गए । यहाँ तक कि मार्ग का ज्ञान न रहा । जिस परिचित मार्ग से आए थे, उसका यहाँ पता न था । नए - नए गांव मिलने लगे । तब दोनों एक खेत के किनारे खडे होकर सोचने लगे, अब क्या करना चाहिए ।

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हीरा ने कहा- 'मुझे मालूम होता है, राह भूल गए' ।
'तुम भी बेतहाशा भागे, वहीं उसे मार गिराना था' ।
'उसे मार गिराते तो दुनिया क्या कहती ? वह अपना धर्म छोड दे, लेकिन हम अपना धर्म क्यों छोडें' ? दोनों भूख से व्याकुल हो रहे थे । खेत में मटर खडी थी, चरने लगे,  रह रहकर आहट लेते रहते थे । कोई आता तो नही है ।
जब पेट भर गया, दोनों ने आजादी का अनुभव किया तो मस्त होकर उछलने कूदने लगे । पहले दोनों ने डकार ली । फिर सींग मिलाए और एक दूसरे को ठेकने लगे । मोती ने हीरा को कई कदम पीछे हटा दिया, यहाँ तक कि वह खाई में गिर गया । तब उसे भी क्रोध आ गया । संभलकर उठा और मोती से भिड गया । मोती ने देखा कि खेल में झगडा हुआ जा रहा है तो किनारे हट गया ।

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अरे ! यह क्या ? कोई साँड डौंकता चला आ रहा है । हाँ, साँड ही है । वह सामने आ पहुंचा । दोनों मित्र बगलें झाँक रहे थे । साँड पूरा हाथी था । उससे भिडना जान से हाथ धोना है, लेकिन न भिडने पर भी जान बचती नजर नही आती । इन्हीं की तरफ आ भी रहा है । कितनी भयंकर सूरत है !
मोती ने मूक भाषा में कहा- 'बुरे फंसे, जान बचेगी ? कोई उपाय सोचो'।
हीरा ने चिंतित स्वर में कहा- 'अपने घमंड में फूला हुआ है, आरजू विनती न सुनेगा'।
'भाग क्यों न चलें' ?
'भागना कायरता है' ।
'तो फिर यहीं मरो । बंदा तो नौ दो ग्यारह होता है' ।
'और जो दौडाए' ?
' तो फिर कोई उपाए सोचो जल्द' !
'उपाय यह है कि उस पर दोनों जने एक साथ चोट करें, मैं आगे से रगेदता हूँ, तुम पीछे से रगेदो, दोहरी मार पडेगी तो भाग खडा होगा । मेरी ओर झपटे, तुम बगल से उसके पेट में सींग घुसेड देना । जान जोखिम है, पर दूसरा उपाय नही है ।
दोनों मित्र जान हथेली पर लेकर लपके, साँड को भी संगठित शत्रुओं से लडने का तजुरबा न था । वह तो एक शत्रु से मल्लयुद्ध करने का आदी था । ज्यों ही हीरा पर झपटा, मोती ने पीछे से दौडाया । साँड उसकी तरफ मुडा तो हीरा ने रगेदा । साँड चाहता था, कि एक - एक करके दोनों को गिरा ले, पर ये दोनों भी उस्ताद थे । उसे वह अवसर न देते थे । एक बार साँड झल्लाकर हीरा का अन्त कर देने के लिए चला कि मोती ने बगल से आकर उसके पेट में सींग भोंक दिया । साँड क्रोध में आकर पीछे फिरा तो हीरा ने दूसरे पहलू में सींगे चुभा दि ।
आखिर बेचारा जख्मी होकर भागा और दोनों मित्रों ने दूर तक उसका पीछा किया, यहाँ तक कि साँड बेदम होकर गिर पडा । तब दोनों ने उसे छोड दिया । दोनों मित्र जीत के नशे में झूमते चले जाते थे ।
मोती ने साँकेतिक भाषा में कहा- 'मेरा जी चाहता था कि बचा को मार ही डालूँ' ।
हीरा ने तिरस्कार किया- 'गिरे हुए बैरी पर सींग न चलाना चाहिए' ।
'यह सब ढोंग है, बैरी को ऐसा मारना चाहिए कि फिर न उठे' ।
'अब घर कैसे पहुँचोगे वह सोचो' ।
'पहले कुछ खा लें, तो सोचें' ।
सामने मटर का खेत था ही, मोती उसमें घुस गया । हीरा मना करता रहा, पर उसने एक न सुनी । अभी दो चार ही ग्रास खाये थे कि आदमी लाठियाँ लिए दौड पडे और दोनों मित्रों को घेर लिया, हीरा तो मेड पर था निकल गया । मोती सींचे हुए खेत में था, उसके खुर कीचड में धंसने लगे, न भाग सका, पकड लिया । हीरा ने देखा, संगी संकट में है तो लौट पडा, फंसेंगे तो दोनों फंसेंगे, रखवालों ने उसे भी पकड लिया ।

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प्रातः काल दोनों मित्र काँजी हौस में बंद कर दिए गए । दोनों मित्रों को जीवन में पहली बार ऐसा साबिका पडा था कि सारा दिन बीत गया और खाने को एक तिनका भी न मिला । समझ में न आता था, यह कैसा स्वामी है । इससे तो गया फिर भी अच्छा था । यहाँ कई भैंसें थी, कई बकरियाँ, कई घोडे, कई गधे, पर किसी के सामने चारा न था, सब जमीन पर मुर्दों की तरह पडे थे ।
कई तो इतने कमजोर हो गये थे कि खडे भी न हो सकते थे । सारा दिन दोनों मित्र फाटक की ओर टकटकी लगाए रहे, पर कोई चारा लेकर आता दिखाई न दिया, तब दोनों ने दीवार की नमकीन मिट्टी चाटनी शुरू की, पर इससे क्या तृप्ति होती ।
रात को भी जब कुछ भोजन न मिला तो हीरा के दिल में विद्रोह की ज्वाला दहक उठी, मोती से बोला- 'अब नही रहा जाता मोती' !
मोती ने सिर लटकाए हुए जवाब दिया- 'मुझे तो मालूम होता है कि प्राण निकल रहे हैं' ।
'आओ दीवार तोड डालें' ।
'मुझसे तो अब कुछ नही होगा' ।
'बस इसी बूत पर अकडते थे' !
'सारी अकड निकल गई' ।
बाडे की दीवार कच्ची थी, हीरा मजबूत तो था ही, अपने नुकीले सींग दीवार में गडा दिए और जोर मारा तो मिट्टी का एक चिप्पड निकल आया, फिर तो उसका साहस बढ़ा उसने दौड , दौडकर दीवार पर चोटें की और हर चोट में थोडी - थोडी मिट्टी गिराने लगा ।
उसी समय काँजी हौस का चौकीदार लालटेन लेकर जानवरों की हाजिरी लेने आ निकला । हीरा का उद्दण्डपन देखकर उसे कई डंडे रसीद किए और मोटी सी रस्सी से बाँध दिया ।
मोती ने पडे - पडे कहा- 'आखिर मार खाई, क्या मिला' ?
'अपने बूते भर जोर तो मार दिया' ।
'ऐसा जोर मारना किस काम का कि और बंधन में पड गए' ।
'जोर तो मारता ही जाऊँगा, चाहे कितने ही बंधन पडते जायें' ।
'जान से हाथ धोना पडेगा' ।
'कुछ परवाह नही,  यों भी तो मरना ही है । सोचो, दीवार खुद जाती तो कितनी जाने बच जाती । इतने भाई यहाँ बंद हैं । किसी की देह में जान नही है । दो चार दिन यही हाल रहा तो मर जाएंगे' ।
'हाँ, यह बात तो है । अच्छा, तो ला फिर मैं भी जोर लगाता हूँ' ।
मोती ने भी दीवार में सींग मारा, थोड़ी सी मिट्टी गिरी और फिर हिम्मत बढ़ी, फिर तो वह दीवार में सींग लगाकर इस तरह जोर करने लगा, मानो किसी प्रतिद्वंदी से लड रहा है । आखिर कोई दो घंटे की जोर आजमाइस के बाद दीवार ऊपर से लगभग एक हाथ गिर गई, उसने दूनी शक्ति से दूसरा धक्का मारा तो आधी दीवार गिर पडी ।
दीवार का गिरना था कि अधमरे से पडे हुए सभी जानवर चेत उठे, तीनों घोडियाँ सरपट भाग निकली । फिर बकरियाँ निकली, इसके बाद भैंस भी खसक गई, पर गधे अभी तक ज्यों के त्यों खडे थे ।
हीरा ने पूछा- 'तुम दोनों क्यों नही भाग जाते' ?
एक गधे ने कहा- 'जो कहीं फिर पकड लिए जाएं' ।
'तो क्या हरज है, अभी तो भागने का अवसर है' ।
'हमें तो डर लगता है । हम यहीं पडे रहेंगे' ।
आधी रात से ऊपर जा चुकी थी । दोनों गधे अभी तक खडे सोच रहे थे कि भागें, या न भागें, और मोती अपने मित्र की रस्सी तोेडने में लगा हुआ था । जब वह हार गया तो हीरा ने कहा- 'तुम जाओ, मुझे यहीं पडा रहने दो, शायद कहीं भेंट हो जाए' ।
मोती ने आँखों में आँसू लाकर कहा- 'तुम मुझे इतना स्वार्थी समझते हो, हीरा हम और तुम इतने दिनों एक साथ रहे हैं। आज तुम विपत्ति में पड गए हो तो मैं तुम्हें छोडकर अलग हो जाऊँ' ?
हीरा ने कहा- 'बहुत मार पडेगी, लोग समझ जायेंगे, यह तुम्हारी शरारत है' ।
मोती ने गर्व से कहा- 'जिस अपराध के लिए तुम्हारे गले में बन्धन पडा, उसके लिए अगर मुझे मार पडे, तो क्या चिन्ता । इतना तो हो ही गया कि नौ दस प्राणियों की जान बच गई, वे सब तो आशीर्वाद देंगे' ।
यह कहते हुए मोती ने दोनों गधों को सींगों से मार - मार कर बाडे से बाहर निकाला और तब अपने बंधु के पास आकर सो गया ।
भोर होते ही मुंशी और चौकीदार तथा अन्य कर्मचारियों में कैसी खलबली मची, यह लिखने की जरूरत नही । बस, इतना ही काफी है कि मोती की खूब मरम्मत हुई और उसे भी मोटी रस्सी से बाँध दिया गया ।
एक सप्ताह तक दोनों मित्र वहाँ बंधे पडे रहे । किसी ने चारे का एक तृण भी न डाला । हाँ, एक बार पानी दिखा दिया जाता था । यही उनका आधार था । दोनों इतने दुर्बल हो गए थे कि उठा तक नही जाता था, ठठरियाँ निकल आई थी ।
एक दिन बाडे के सामने डुग्गी बजने लगी और दोपहर होते - होते वहाँ पचास, साठ आदमी जमा हो गए । तब दोनों मित्र निकाले गए और लोग आकर उनकी सूरत देखते और मन फीका करके चले जाते । ऐसे मृतक बैलों का कौन खरीददार होता ?
सहसा एक दढ़ियल आदमी, जिसकी आँखें लाल थी और मुद्रा अत्यन्त कठोर, आया और दोनों मित्रों के कूल्हों में उंगली गोदकर मुंशीजी से बातें करने लगा । चेहरा देखकर अंतर्ज्ञान से दोनों मित्रों का दिल काँप उठा । वह कौन है और क्यों टटोल रहा है, इस विषय में उन्हें कोई संदेह न हुआ । दोनों ने एक दूसरे को भीत नेत्रों से देखा और सिर झुका लिया ।
हीरा ने कहा- 'गया के घर से नाहक भागे, अब तो जान न बचेगी' । मोती ने अश्रद्धा के भाव से उत्तर दिया- 'कहते हैं, भगवान सबके ऊपर दया करते हैं, उन्हें हमारे ऊपर दया क्यों नही आती' ?
'भगवान के लिए हमारा जीना मरना दोनों बराबर है । चलो, अच्छा ही है, कुछ दिन उसके पास तो रहेंगे । एक बार उस भगवान ने उस लडकी के रूप में हमें बचाया था । क्या अब न बचाएंगे' ?
'यह आदमी छुरी चलाएगा, देख लेना' ।
'तो क्या चिंता है ? माँस, खाल, सींग, हड्डी सब किसी के काम आ जाएगा' ।
नीलाम हो जाने के बाद दोनों मित्र उस दढ़ियल के साथ चले । दोनों की बोटी - बोटी काँप रही थी । बेचारे पाँव तक न उठा सकते थे, पर भय के मारे गिरते पडते भागे जाते थे, क्योंकि वह जरा भी चाल धीमी हो जाने पर डंडा जमा देता था ।

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राह में गाय बैलों का एक रेवड हरे - भरे हार में चरता नजर आया । सभी जानवर प्रसन्न थे, चिकने, चपल । कोई उछलता था, कोई आनंद से बैठा पागुर करता था कितना सुखी जीवन था इनका, पर कितने स्वार्थी हैं सब । किसी को चिंता नही कि उनके दो भाई बधिक के हाथ पडे कैसे दुखी हैं ।
सहसा दोनों को ऐसा मालूम हुआ कि परिचित राह है । हाँ, इसी रास्ते से गया उन्हें ले गया था । वही खेत, वही बाग, वही गाँव मिलने लगे, प्रतिक्षण उनकी चाल तेज होने लगी । सारी थकान, सारी दुर्बलता गायब हो गई । आह ! यह लो ! अपना ही हार आ गया । इसी कुँए पर हम पुर चलाने आया करते थे, यही कुँआ है ।
मोती ने कहा- 'हमारा घर नजदीक आ गया है' ।
हीरा बोला - 'भगवान की दया है' ।
'मैं तो अब घर भागता हूँ' ।
'यह जाने देगा' ?
इसे मैं मार गिराता हूँ ।
'नही - नही, दौडकर थान पर चलो । वहाँ से आगे हम न जायेंगे' ।
दोनों उन्मत्त होकर बछडों की भाँति कुलेलें करते हुए घर की ओर दौडे । वह हमारा थान है । दोनों दौडकर अपने थान पर आए और खडे हो गए । दढ़ियल भी पीछे - पीछे दौडा चला आता था ।
झूरी द्वार पर बैठा धूप खा रहा था । बैलों को देखते ही दौडा और उन्हें बारी - बारी से गले लगाने लगा । मित्रों की आँखों से आनन्द के आँसू बहने लगे । एक झूरी का हाथ चाट रहा था ।
दढ़ियल ने जाकर बैलों की रस्सियां पकड ली ।
झूरी ने कहा- 'मेरे बैल हैं।'
'तुम्हारे बैल कैसे हैं ? मैं मवेसीखाने से नीलाम लिए आता हूँ' ।
''मैं तो समझता हूँ, चुराए लिए जाते हो ! चुपके से चले जाओ, मेरे बैल हैं । मैं बेचूंगा तो बिकेंगे । किसी को मेरे बैल नीलाम करने का क्या अधिकार है" ?
'जाकर थाने में रपट कर दूँगा' ।
'मेरे बैल हैं । इसका सबूत यह है कि मेरे द्वार पर खडे हैं ।
दढ़ियल झल्लाकर बैलों को जबरदस्ती पकड ले जाने के लिए बढ़ा । उसी वक्त मोती ने सींग चलाया । दढ़ियल पीछे हटा, मोती ने पीछा किया, दढ़ियल भागा, मोती पीछे दौडा, गाँव के बाहर निकल जाने पर वह रुका, पर खडा दढ़ियल का रास्ता वह देख रहा था, दढ़ियल दूर खडा धमकियाँ दे रहा था, गालियाँ निकाल रहा था, पत्थर फेंक रहा था, और मोती विजयी शूर की भाँति उसका रास्ता रोके खडा था । गाँव के लोग यह तमाशा देखते थे और हँसते थे । जब दढ़ियल हारकर चला गया तो मोती अकडता हुआ लौटा ।
हीरा ने कहा- 'मैं तो डर गया था कि कहीं तुम गुस्से में आकर मार न बैठो' ।
'अब न आएगा'
'आएगा तो दूर से ही खबर लूँगा । देखूँ, कैसे ले जाता है' ।
'जो गोली मरवा दे' ?
'मर जाऊँगा, पर उसके काम न आऊँगा' 
'हमारी जान को कोई जान ही नही समझता'
'इसलिए कि हम इतने सीधे हैं'
जरा देर में नाँदों में खली भूसा, चोकर और दाना भर दिया गया और दोनों मित्र खाने लगे । झूरी खडा दोनों को सहला रहा था । वह उनसे लिपट गया ।
झूरी की पत्नी भी भीतर से दौडी - दौडी आई । उसने आकर दोनों बैलों के माथे चूम लिए ।
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