"तीन कंजूस"

एक बार की बात है एक किसानों का गाँव था । बहुत ही खुशहाल और सम्पन लोगों का गाँव । उनकी खुशहाली और सम्पनता की वजह थी उनकी जमीन ।

दूध का दाम

बडे - बडे शहरों में दाइयाँ, नर्सें और लेडी डाक्टर, सभी पैदा हो गयी हैं, लेकिन देहातों में जच्चेखानों पर अभी तक भंगिनों का ही प्रभुत्व है

चुहिया का स्वयंवर

गंगा नदी के किनारे एक तपस्वियों का आश्रम था । वहाँ याज्ञवल्क्य नाम के मुनि रहते थे । मुनिवर एक दिन.....

ओहदे का नशा

सुबह – सुबह का समय था, सैनिकों की एक बटालियन अपने देश के बहुत महत्वपूर्ण सुरक्षा क्षेत्र में खुदाई कर रही....

दो बैलों की कथा

झूरी के पास दो बैल थे - हीरा और मोती । देखने में सुन्दर, काम में चौकस, डील में ऊँचे, बहुत दिनों साथ रहते - रहते दोनों में भाईचारा हो गया था......

Sunday, 23 February 2020

Panchtantra ki kahaniyan "धूर्तों की संगत"


           Panchtantra ki kahaniyan अपने आप में काफी कुछ संजो के रखती हैं यह सिर्फ एक कहानी न हो कर ज्ञान और खास कर नैतिक ज्ञान को सहेज कर प्रस्तुत करती हैं और अगर देखा जाय तो वो सब जो हमारे व्यक्तित्व को परखता है और फिर दिशा देने का प्रयत्न करता है वह ज्ञान कहलाता है और कहानियाँ इसका एक अभिन्न अंग होती हैं तो इसी कडी में एक रोचक पंचतन्त्र की कहानी है धूर्तों की संगत ।

"धूर्तों की संगत" Panchtantra ki kahaniya in hindi

           एक जंगल था, जंगल में मदोत्कट नाम का शेर निवास करता था । एक बूढा बाघ, धूर्त सियार और चापलूस कौवा ये तीनों उसके नौकर थे । एक दिन चारों धूप में बैठे सुस्ता रहे थे कि उन्होंने एक ऊँट को अपनी ओर आते देखा जो अपने झुण्ड से भटक कर जंगल की ओर आ गया था । उसको देखकर शेर कहने लगा, “अरे वाह, यह तो विचित्र जीव है । जाकर पता तो लगाओ कि यह वन्य जीव है या  ग्राम्य प्राणी” यह सुनकर कौआ बोला, “स्वामी, यह ऊँट नामक जीव ग्राम्य  प्राणी है और आपका भोजन है । आप इसको मारकर खा जाइए"।
शेर बोला, “मैं अपने यहाँ आने वाले अतिथि को नही मारता । कहा गया है कि विश्वस्त और निर्भय होकर अपने घर आए शत्रु को भी नही मारना चाहिए । अतः उसको आदर पूर्वक यहाँ मेरे पास ले आओ जिससे मैं उसके यहाँ आने का कारण पूछ सकूँ" ।
Panchtantra ki kahaniyan
Panchtantra ki kahaniyan
          शेर की आज्ञा पाकर उसके अनुचर ऊँट के पास गए और उसको आदर पूर्वक शेर के पास ले आये । ऊँट ने शेर को प्रणाम किया और बैठ गया । शेर ने जब उसके वन में विचरने का कारण पूछा तो उसने अपना परिचय देते हुए बताया कि वह साथियों से बिछड कर भटक गया है । शेर के कहने पर उस दिन से वह कथनक नाम का ऊँट उनके साथ ही रहने लगा ।
          उसके कुछ दिन बाद शेर का एक जंगली हाथी के साथ घमासान युद्ध हुआ । उस हाथी के मूसल के समान दाँतों के प्रहार से शेर अधमरा तो हो गया किन्तु किसी तरह जीवित रहा, पर वह चलने - फिरने में अशक्त हो गया था । उसके अशक्त हो जाने से कौवे आदि उसके नौकर भूखे रहने लगे । क्योंकि शेर जब शिकार करता था तो उसके नौकरों को उसमें से भोजन मिला करता था । किन्तु अब शेर शिकार करने में असमर्थ था ।
          उनकी दुर्दशा देखकर शेर बोला, “मैं तो शिकार करने में असमर्थ हूँ इसलिए तुम किसी ऐसे जीव की खोज करो कि जिसको तुम आसानी से मार सको और हम लोगों के भोजन की व्यवस्था हो सके" । शेर की आज्ञा पाकर वे चारों जंगल के हर तरफ शिकार की तलाश में निकले, जब कहीं कुछ नही मिला तो कौवे और सियार और बाघ  ने परस्पर मिलकर सलाह की । सियार बोला, “मित्रो, इधर - उधर भटकने से क्या लाभ ? क्यों न इस कथनक को मारकर उसका ही भोजन किया जाए” ?
          सियार शेर के पास गया और वहाँ पहुँचकर कहने लगा, “स्वामी, हम सबने मिलकर सारा वन छान मारा है, किन्तु कहीं कोई ऐसा पशु नही मिला कि जिसको हम मार पाते और अपने महाराज की भूख शांत कर पाते । अब भूख इतनी सता रही है कि हमारे लिए एक भी पग चलना कठिन हो गया है । आप बीमार हैं । यदि आपकी आज्ञा हो तो आज कथनक के माँस से ही आपके खाने का प्रबन्ध किया जाय” ।
            शेर ने यह कहते हुए मना कर दिया कि उसने ऊँट को अपने यहाँ पनाह दी है इसलिए वह उसे मार नही सकता । पर सियार ने शेर को किसी तरह मना ही लिया । राजा की आज्ञा पाते ही सियार तत्काल अपने साथियों को बुला लाया और चुपचाप कौवे और बूढे बाघ को समझा दिया कि शेर के सामने अपने प्राण देने का ढोंग करना है वो उन्हें बचा लेगा । उसके साथ ऊँट भी आया, उन्हें देखकर शेर ने पूछा, “तुम लोगों को कुछ मिला” ?

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          कौवा, सियार, बाघ सभी जानवरों ने बता दिया कि उन्हें कुछ नही मिला । पर अपने राजा की भूख मिटाने के लिए सभी बारी - बारी से शेर के आगे आए और विनती की कि वह उन्हें मारकर खा लें । पर सियार हर किसी में कुछ न कुछ खामी बता देता ताकि शेर उन्हें न मार सके।
कौवा बोला - "मालिक इतने दिन तक आपने मेरा लालन पालन किया आपकी दसा मुझसे देखी नही जाती आप मुझे मार कर भोजन कर लीजिये" ।
तो सियार तपाक से बोला - "तुम तो बहुत छोटे हो दोस्त इससे महाराज की भूख कहाँ शांत होगी" ।
बाघ बोला - " तो महारज मुझे मार कर आप भोजन कर लीजिए वैसे भी में बूढा हूँ आपकी सेवा नही कर पाता हूँ आपने इतने समय तक मुझे भोजन कराया है मेरा खयाल रखा है मैं आपके लिए सहर्ष अपने प्राण देने को तैयार हूँ  आप आज का भोजन मेरे ही माँस से कीजिये" ।
सियार फिर बोला - "आप तो बहुत बूढे हो चुके हो आपकी तो चमडी और माँस बहुत सख्त हो गया है महाराज पहले ही इतने घायल हैं आपको कैसे मार सकेंगे आपको बहुत यातना होगी और अगर जैसे तैसे आपके प्राण चले भी गए तो महाराज आपके माँस का एक निवाला भी नही चबा पायेंगे और आपका बलिदान व्यर्थ चला जायेगा" । इसलिए महाराज आप मुझे मार कर भोजन कर लीजिये ।
फिर एक क्षण रुका और इससे पहले कि कोई कुछ बोलता, सियार बोला - " किन्तु महाराज मेरे तो सारे शरीर में बहुत सारे बाल हैं, मैं एक सियार हूँ तो मेरा माँस भी बहुत बदबूदार होगा,मेरे अन्नदाता आप पहले ही इतने घायल और बीमार हो कहीं मेरे बदबूदार माँस खाने से आपकी हालत और नाजुक हो गयी और आपकी मृत्यु हो गयी तो । नही - नही मेरे मालिक मैं यह अन्याय नही कर सकता हूँ, मैं अपने महाराज की मृत्यु का कारण बन कर पाप का भागीदार नही बन सकता क्षमा करना महाराज मैं आपकी भूख नही मिटा पाया" । और यह कह कर सियार दुखी होने का नाटक कर के चुपचाप एक तरफ बैठ गया ।
Panchtantra ki kahaniyan in hindi
Panchtantra ki kahaniyan
       बेचारे सीधे - साधे कथनक ऊँट ने जब यह देखा कि सभी सेवक अपनी जान देने की विनती कर रहे हैं तो वह भी पीछे नही रहा । उनकी स्वामी भक्ति को देख कर उसका हृदय पसीज गया
उसने शेर को प्रणाम करके कहा, “स्वामी, ये सभी आपके लिए अभक्ष्य हैं । किसी का आकार छोटा है, किसी का माँस बूढा होने के कारण सख्त हो गया है, किसी की देह पर घने बाल हैं और माँस बदबूदार है, किन्तु मैं आकार में भी बडा हूँ, बूढा भी नही हूँ और में सियार नही हूँ तो मेरा माँस भी बदबूदार नही होगा  इसलिये आप मुझे मार कर मेरे माँस से अपनी भूख मिटाइये जिससे कि मुझे पुण्य की प्राप्ति हो सके” ।
कथनक का इतना कहना था कि बाघ और सियार उस पर झपट पडे और देखते ही देखते उसके पेट को चीरकर रख दिया । बस फिर क्या था, भूख से पीडित शेर और बाघ आदि ने तुरन्त ही उसको चट कर डाला ।

Moral of the story

शिक्षा -: "धूर्तों की संगत" कभी नही करनी चाहिये, किन्तु विवशता बस अगर धूर्तों के साथ रहना पडे तो पूरी तरह से सतर्क रहना चाहिये, उनकी मीठी बातों में तो बिलकुल नही आना चाहिये और विवेकहीन तथा मूर्ख स्वामी से भी दूर रहने में ही भलाई है ।
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Friday, 14 February 2020

"ये भी सेवा है" Moral Story


जीवन में नैतिक ज्ञान ( Moral Education ) का क्या महत्व है यह एक सीखने का महत्वपूर्ण विषय है जीवन एक कभी न थमने वाली अविरल चलने वाली धारा की तरह है जो हर पल हर समय बस चलता ही रहता है जब तक कि मृत्यु की सच्चाई से सामना न हो जाय और जीवन की इस धारा में जो पहला महत्वपूर्ण नियम है वह है नैतिकता जो किसी भी व्यक्ति विशेष के जीवन को शिष्ठ बनाती है जीवन में दया, करुणा, प्रेम, सौहार्द भर देती है तो परिचित होते हैं एक ऐसी ही नैतिक कहानी ( Moral Story ) से जो बताती है कि नैतिकता इतनी सरल भी हो सकती है ।

"ये भी सेवा है" Best Moral Story in hindi

         मैं ऑफिस बस से ही आती जाती हूँ आप भी अक्सर बस में सफर करते होंगे शहरों में एक मिडिल क्लास व्यक्ति के लिए सस्ता और टिकाऊ परिवहन का साधन बस ही है। यह मेरी भी दिनचर्या का हिस्सा है । उस दिन भी बस स्टॉप पर खडे - खडे काफी वक्त हो गया था बस काफी देर से आई, लगभग आधे - पौन घंटे बाद । खडे - खडे पैर दुखने लगे थे । पर चलो शुक्र था कि बस मिल गई । देर से आने के कारण भी और पहले से ही बस में काफी भीड थी ।
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        खैर बस में चढ कर मैंनें चारों तरफ नजर दौडाई तो पाया कि सभी सीटें भर चुकी थी । उम्मीद की कोई किरण नजर नही आई । टिकट ले के मैं थोडा आगे बडी और एक पोल को पकड कर खडी हो गयी तभी एक औरत ने जिसके सामने मैं खडी थी अपनी सीट देते हुए कहा, "मैडम जी आप यहाँ बैठ जाइये " । मैंने उसे धन्यवाद देते हुए उस सीट पर बैठकर राहत को साँस ली । मुझे लगा कि मैंने उसे कहीं देखा है फिर याद आया वो महिला तो मेरे साथ बस स्टॉप पर खडी थी तब मैंने उस पर ध्यान नही दिया था ।
         कुछ देर बाद मेरे पास वाली सीट खाली हुई, तो मैंने उसे बैठने का इशारा किया । तब उसने अपने से पीछे खडी एक महिला को उस सीट पर बैठने को कहा जिसकी गोद में एक छोटा बच्चा था । वो बेचारी भीड की धक्का -मुक्की सहते हुए उस पोल को पकड कर खडी थी । कुछ  स्टॉप निकलने के बाद जब वह बच्चे वाली औरत अपने स्टॉप पर उतरने को उठी तो मैंने फिर उसे बैठने का इशारा किया और वह सीट पर बैठ गयी बस थोडा ही चली थी कि पीछे से एक बुजुर्ग आये और उस पोल के सहारे खडे हो गये।
          इस बार भी वह महिला सीट से उठी और उन बुजुर्ग को सीट पर बिठा कर खुद फिर उसी पोल के सहारे खडी हो गयी, मुझे आश्चर्य हुआ कि इतना लम्बा सफर, हम दिन -रात बस की सीट के लिये बेतहजीब धक्का - मुक्की कर के बस में चढते हैं अक्सर सीट के लिये लडते रहते हैं और ये किस मिट्टी की बनी है जो सीट मिलती है और दूसरे को दे देती है ।
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        कुछ देर बाद जब वो बुजुर्ग भी अपने स्टॉप पर उतर गए, तब वो फिर सीट पर बैठी । मुझसे रहा नही गया, तो उससे पूछ बैठी ।
 "तुम्हें थकान नही होती है क्या तुम्हें तो सीट मिल गई थी एक या दो बार नही, बल्कि तीन बार, फिर भी तुमने सीट औरों को दे दी ? तुम भी काम से लौट रही हो थकी हुई लग रही हो, आराम की जरूरत तो तुम्हें भी होगी, फिर क्यों नही बैठी ?
          मेरी इस बात का उसने जो जवाब दिया उसकी उम्मीद मैंने कभी नही की थी । उसने कहा, "मैं भी थकती हूँ मैडम जी । आप से पहले से स्टॉप पर खडी थी, मेरे भी पैरों में दर्द होने लगा था । जब मैं बस में चडी थी तब यही सीट खाली थी । मैंने देखा आपके पैरों में तकलीफ होने के कारण आप धीरे - धीरे बस में चडी । ऐसे में आप कैसे खडी रहती इसलिये मैंने आपको सीट दे दी । उस बच्चे वाली महिला को सीट इसलिये दी उसकी गोद में छोटा बच्चा था जो बहुत देर से रो रहा था । उसने सीट पर बैठते ही सुकून महसूस किया और वो बेचारे बुजुर्ग उनके खडे रहते मैं कैसे बैठती, सो उन्हें दे दी ।
मैंने कहा - " लेकिन तुम भी तो थकी हुई हो और तुम्हें भी आराम चाहिये होगा " ?
         आप लोगों को सीट पर बैठ कर सुकून मिला तो मुझे भी अन्दर से सुकून मिला मैडम जी । कुछ देर का सफर है मैडम जी, सीट के लिये क्या लडना । वैसे भी सीट को तो बस में ही छोड कर जाना है, घर तो नही ले जाना है ना । मैं ठहरी झाडू पोछा करने वाली, दिन भर लोगों के घरों में काम करती हूँ तब जा के घर चलता है, मेरे पास क्या है, न दान करने लायक धन है, न कोई पुण्य कमाने लायक करने को कुछ । इसलिए रास्ते से कचरा हटा देती हूँ, रास्ते के पत्थर बटोर देती हूँ, कभी कोई पौधा लगा देती हूँ । ऐसे ही जरूरत मंदों को बस में अपनी सीट दे देती हूँ । यही है मेरे पास, मुझे यही करना आता है , मैडम जी वो कहावत तो आपने सुनी ही होगी  "सेवा करोगे तो मेवा मिलेगा" । बस ऐसे ही छोटी - छोटी सेवा करके थोडा मैं भी पूण्य कमा लेती हूँ ।

सीख भले ही Moral story से मिले

         उसका स्टॉप आ गया, वो तो मुस्करा कर चली गई पर मुझे आत्ममंथन करने को मजबूर कर गई । मुझे उसकी बातों से एक सीख मिली कि हम बडा कुछ नही कर सकते  तो समाज में एक छोटा सा, नगण्य दिखने वाला कार्य तो कर ही सकते हैं । ये महिला उन लोगों के लिये सबक है जो आयकर बचाने के लिए अपनी काली कमाई को दान के नाम पर खपाते हैं, या फिर वो लोग जिनके पास पर्याप्त साधन होने के बाबजूद भी समाज की परवाह नही करते हैं, या वो लोग जो समाज में पसरे छोटी - छोटी बुराईयों को ठीक करने की बजाय यह कह देते हैं कि मुझे इससे क्या, या फिर वो लोग जो समाजसेवा के नाम पर बडी - बडी बातें करते हैं परन्तु इन छोटी - छोटी बातों पर कभी ध्यान नही देते ।

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 मैंने मन ही मन उस महिला को नमन किया तथा उससे सीख ली यदि हमें समाज के लिए कुछ करना हो, तो वह दिखावे के लिए न किया जाए बल्कि खुद की संतुष्टि के लिए हो ।

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Wednesday, 29 January 2020

"तीन कंजूस" hindi kahaniya


ज्ञान वर्धन और समय के सदुपयोग के साथ - साथ hindi kahaniya मनोरंजन और मन को प्रसन्न रखने का भी उत्तम साधन होती हैं । कहानी समाज के हर पहलू का आकलन करना सिखाती है एक प्रकार से कहा जाय तो मन को समाज के साथ न्याय करना सिखाती है अक्सर कहानीयाँ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से समाज का ही चरित्र  होती हैं बस यह समय और परिस्थिति पर निर्भर करता है कि कहानी किस पहलू को रेखाँकित कर रही है समाज के इसी कडी में से यह "तीन कंजूसों " की hindi kahani प्रस्तुत है ।

Hindi kahaniya "तीन कंजूस"

एक बार की बात है एक किसानों का गाँव था  । बहुत ही खुशहाल और सम्पन लोगों का गाँव । उनकी खुशहाली और सम्पनता की वजह थी उनकी जमीन । वहाँ की जमीन बहुत उपजाऊ थी और हर किसान के पास परिवार की आजीविका से ज्यादा जमीन थी ।
गाँव के पास ही एक नदी बहती थी । नदी का पानी नहर के द्वारा खेतों में आसानी से आ जाता  था जिससे वहाँ की भूमि पर बहुत सारा अनाज और साग - सब्जीयाँ उगती थी  फलदार पेडों की भी कमी नही थी । गाँव के लोग अपनी जमीन पर खूब अनाज और सब्जियाँ उगाते और अपनी जरूरत के अनुसार रखने के बाद जो अनाज और सब्जियाँ  बचती उसे बाजार में बेच देते जिससे उनके पास धन की भी कोई कमी न थी । 
Hindi kahaniya "तीन कंजूस", kahaniya
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गाँव में तीन कंजूस भी रहते थे तीनों का परिवार भी था बाल बच्चे भी थे तीनों के पास खेती की अच्छी खासी जमीन भी थी जिसमें और किसानों की ही तरह बहुत सारा अनाज और सब्जियाँ उगती थी । उनके पास भी अनाज और सब्जियाँ बेच के बहुत सारा धन था किन्तु खर्चा करने का तो वो नाम भी नही लेते थे ।
गाँव में सब लोग जानते थे कि तीनों महा कंजूस हैं इतने कंजूस की अनाज बेचने भी बाजार नही जाते थे कि कहीं बाजार जा के कुछ खर्चा न हो जाय कुछ दुकानदार गाँव में ही आ के अनाज खरीद ले जाते थे बस उन्हीं को अपना अनाज वगैरह बेच देते थे । इसलिये तीनों अलग ही रहते थे और लोग भी उनसे दूर - दूर ही रहते थे । लोग उन्हें कंजूस - कंजूस कह के चिढाया भी करते थे किन्तु तीनों महाशय थे कि किसी की परवाह ही न करते थे ।
एक दिन तीनों कंजूस आपस में बातें कर रहे थे अचानक से जाने क्या चमत्कार हुआ तीनों ने  बाजार जा के कुछ खरीदने का फैसला किया ।
पहला कंजूस बोला - हमें लोग कंजूस - कंजूस कह के चिढाते हैं ऐसा करते हैं बाजार जा के कुछ खरीद लाते हैं और लोगों को दिखा देते हैं कि हम कंजूस नही हैं । बस हम फिजूलखर्ची नही करते हैं ।
Hindi kahaniya "तीन कंजूस", kahaniya
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दूसरा कंजूस बोला - आपने पते की बात की है लोगों का मुँह बंद करने का यही एक तरीका है ।
तीसरा कंजूस बोला - हाँ सही है कुछ खरीद लाते हैं जो बहुत दिनों तक भी चल जाय और ज्यादा महंगा भी न हो ।
आखिरकार तीनों ने फैसला किया कि आज ही बाजार जा के कुछ खरीद लाते हैं और तीनों बाजार चले गए । बाजार की चहल - पहल से उनकी आँखें चौंधिया गयी कंजूस थे कभी बाजार तो जाते न थे बाजार के जरूरत की चीजों से या तो परहेज कर लेते या अति आवश्यक चीजें थोडे से पैसे देके घर वालों को भेज के मंगा लेते ।
तीनों ने बाजार के कही चक्कर लगाए, कही दुकानों पर जा - जा के मोलभाव किया । बहुत छानबीन और मोलभाव करने के बाद तीनों ने फैसला किया कि घी खरीद लेते हैं घी खायेंगे तो सेहत भी बनेगी और लोग भी कंजूस बोलना बन्द कर देंगे । तीनों ढाई - ढाई सौ ग्राम की एक - एक शीशी घी खरीद के वापस घर आ गए ।

Best part of story

महीना भर बीत गया एक दिन खेत से लौटते हुए तीनों रास्ते में मिल गए हाल चाल पूछने की बजाय आपस में घी की बात करने लगे । किसका कितना घी खर्च हुआ इस पर चर्चा होने लगी ।
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पहला कंजूस बोला - भाई हम तो रोज घी में चुपडी हुई रोटियाँ खाते हैं पर मेरा घी तो अभी जैसे का तैसा है बस जरा सा खर्च हुआ है ।
दूसरा कंजूस बोला - कैसे भाई कैसे खाते हो ।
पहला कंजूस बोला - भाई जब रोटियाँ बनती हैं खाने के लिए बैठने से पहले मैं सबसे ऊपर की और सबसे नीचे की रोटी पर घी लगा देता हूँ बस ! और बाकी की रोटियाँ घी लगी हुई समझ के खा लेता हूँ आहा क्या स्वाद आता है रोटी खाने में ।
दूसरा कंजूस बोला - बाप रे बाप इतना ज्यादा खर्च ।
पहला कंजूस बोला - क्यों भाई तुम कैसे खाते हो ?
दूसरा कंजूस बोला - भाई में तो जब सारी रोटियाँ बन जाती हैं तो सारी रोटियों को एक के ऊपर एक लाइन में रख के एक लंबी सुई को घी में डुबो के रोटियों के बीचों बीच चुभो देता हूँ सारी रोटियों पर घी लग जाता है सुई निकाल के अलग रख दी और फिर आनन्द से खाता हूँ । मेरा घी तो बस नाम का ही खर्च हुआ है ।
तीसरा कंजूस बोला - हद करते हो भाई तुम दोनों तो बहुत ही ज्यादा खर्चीले हो ।
पहला कंजूस बोला - क्यों भाई तुम नही खाते हो क्या घी ?
तीसरा कंजूस बोला - क्यों नही ! मैं तो रोज खाता हूँ पर मेरा घी तो जितना लिया था अब भी उतना ही है ।
पहला कंजूस बोला - हमें भी तो बताओ तुम कैसे खाते हो जो जरा भी खर्च नही हुआ अब तक ।
तीसरा कंजूस बोला - भाई मैं तो सारी रोटियाँ बनने के बाद हर एक रोटी पर घी की शीशी मल देता हूँ और फिर शीशी का ढक्कन खोल के रोटी खाने बैठ जाता हूँ आहा क्या खुशबू आती है और मैं रोटियों को घी लगा हुआ समझ के खा लेता हूँ । एक बूँद भी घी खर्च नही होता है और खाने में भी आनन्द आ जाता है ।

और कहानियाँ पढे

दोनों कंजूस बोले - वाह मानना पडेगा भाई तुमने सही कहा हम बहुत खर्चीले हैं । आज से हम भी ऐसे ही घी का इस्तेमाल करेंगे ताकी "हींग लगे न फिटकरी और रंग निकले चोखा" यानी कि खाने में भी आनन्द आ जाय और घी की एक बूँद भी खर्च न हो ।
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Saturday, 25 January 2020

"दूध का दाम" Munshi prem chand


           एक कवि और कवि द्वारा की गयी रचना के तौर पर Munshi Prem Chand जी ने अपनी रचनाओं में व्यापक और रचनात्मक रूप से समाज को अंकित किया है । समाज के अनेक अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डाला है । समाज के अन्दर रचे, बसे अच्छाइयों, बुराइयों को तरीके से सहेज कर कहानी  के रूप में प्रस्तुत किया है । उन्ही कहानियों  में से एक है "दूध का दाम"

Munshi Prem chand "दूध का दाम"


          बडे - बडे शहरों में दाइयाँ, नर्सें और लेडी डाक्टर, सभी पैदा हो गयी हैं, लेकिन देहातों में जच्चेखानों पर अभी तक भंगिनों का ही प्रभुत्व है । और निकट भविष्य में इसमें कोई तब्दीली होने की आशा भी नही । बाबू महेशनाथ अपने गाँव के जमींदार थे, शिक्षित थे और जच्चेखानों में सुधार की आवश्यकता को मानते थे, लेकिन इसमें जो बाधाएँ थी, उन पर कैसे विजय पाते ? कोई नर्स देहात में जाने पर राजी न हुई और बहुत कहने सुनने से राजी भी हुई, तो इतनी लम्बी चौडी फीस माँगी कि बाबू साहब को सिर झुकाकर चले आने के सिवा और कुछ न सूझा ।
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           लेडी डाक्टर के पास जाने की उन्हें हिम्मत न पडी । उसकी फीस पूरी करने के लिए तो शायद बाबू साहब को अपनी आधी जायदाद बेचनी पडती इसलिए जब तीन कन्याओं के बाद वह चौथा लडका पैदा हुआ, तो फिर वही गूदड था और वही गूदड की बहू ।
           बच्चे अक्सर रात ही को पैदा होते हैं । एक दिन आधी रात को चपरासी ने गूदड के द्वार पर ऐसी हाँक लगायी कि आस पडोस में भी जाग पड गयी । लडकी न थी कि मरी आवाज से पुकारता ।
         गूदड के घर में इस शुभ अवसर के लिए महीनों से तैयारी हो रही थी । भय था तो यही कि फिर बेटी न हो जाय, नही तो वही बँधा हुआ एक रुपया और एक साडी मिलकर रह जायगी । इस विषय में पति - पत्नी में कितनी ही बार झगडा हो चुका था, शर्त लग चुकी थी । स्त्री कहती थी, 'अगर अबकी बेटा न हो तो मुँह न दिखाऊँ, हाँ - हाँ, मुँह न दिखाऊँ, सारे लच्छन बेटे के हैं, और गूदड कहता था, 'देख लेना, बेटी होगी और बीच खेत बेटी होगी । बेटा निकले तो मूँछें मुँडा लूँ, हाँ - हाँ, मूँछें मुडा लूँ । 'शायद गूदड समझता था कि इस तरह अपनी स्त्री में पुत्र कामना को बलवान करके वह बेटे की अवाई के लिए रास्ता साफ कर रहा है ।
भूँगी बोली, 'अब मूँछ मुँडा ले दाढीजार ! कहती थी, बेटा होगा, सुनता ही न था । अपनी ही रट लगाये जाता था । मैं आज तेरी मूछें मूडूँगी, खूँटी तक तो रखूँगी ही नही' ।
गूदड ने कहा, 'अच्छा मूड लेना भलीमानस ! मूछें क्या फिर निकलेंगी ही नही ? तीसरे दिन देख लेना, फिर ज्यों की त्यों हैं, मगर जो कुछ मिलेगा, उसमें आधा रख लूँगा, कहे देता हूँ ।
भूँगी ने अँगूठा दिखाया और अपने तीन महीने के बालक को गूदड के सुपुर्द कर सिपाही के साथ चल खडी हुई ।
गूदड ने पुकारा, 'अरी ! सुन तो, कहाँ भागी जाती है ? मुझे भी बधाई बजाने जाना पडेगा । इसे कौन सँभालेगा' ?
भूँगी ने दूर से ही कहा, 'इसे वहीं धरती पर सुला देना । मैं आके दूध पिला जाऊँगी' ।
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         महेशनाथ के यहाँ अब भूँगी की खूब खातिरदारियाँ होने लगी । सबेरे हरीरा मिलता, दोपहर को पूरियाँ और हलवा, तीसरे पहर को फिर और रात को फिर और गूदड को भी भरपूर परोसा मिलता था । भूँगी अपने बच्चे को अपना दूध दिन - रात में एक दो बार से ज्यादा न पिला सकती थी। उसके लिए ऊपर के दूध का प्रबन्ध था । भूँगी का दूध बाबूसाहब का भाग्यवान बालक पीता था । और यह सिलसिला बारहवें दिन भी न बन्द हुआ । मालकिन मोटी - ताजी देवी थी, पर अबकी कुछ ऐसा संयोग कि उन्हें दूध हुआ ही नही ।
          तीनों लडकियों की बार इतने इफरात से दूध होता था कि लडकियों को बदहजमी हो जाती थी । अब की एक बूँद नही । भूँगी दाई भी थी और दूध पिलाई भी । मालकिन कहती 'भूँगी, हमारे बच्चे को पाल दे, फिर जब तक तू जिये, बैठी खाती रहना । पाँच बीघे माफी दिलवा दूँगी । नाती - पोते तक चैन करेंगे' और भूँगी का लाडला ऊपर का दूध हजम न कर सकने के कारण बार - बार उल्टी करता और दिन - दिन दुबला होता जाता था ।
भूँगी कहती, 'बहूजी, मूँडन में चूडे लूँगी, कहे देती हूँ' ।
बहूजी, उत्तर देती, 'हाँ - हाँ, चूडे लेना भाई, धमकाती क्यों है ? चाँदी के लेगी या सोने के' ।
'वाह बहूजी ! चाँदी के चूडे पहन के किसे मुँह दिखाऊँगी और किसकी हँसी होगी' ?
'अच्छा, सोने के लेना भाई, कह तो दिया' ।
'और ब्याह में कण्ठा लूँगी और चौधरी (गूदड) के लिए हाथों के तोडे' ।
'वह भी लेना, भगवान वह दिन तो दिखावे' ।
           घर में मालकिन के बाद भूँगी का राज था । महरियाँ, महराजिन, नौकर - चाकर सब उसका रोब मानते थे । यहाँ तक कि खुद बहूजी भी उससे दब जाती थी । एक बार तो उसने महेशनाथ को भी डाँटा था । हँसकर टाल गये । बात चली थी भंगियों की । महेशनाथ ने कहा था दुनिया में और चाहे जो कुछ हो जाय, भंगी - भंगी ही रहेंगे । इन्हें आदमी बनाना मुश्किल है । इस पर भूँगी ने कहा था मालिक, भंगी तो बडे - बडों को आदमी बनाते हैं, उन्हें कोई क्या आदमी बनायेगा । यह गुस्ताखी करके किसी दूसरे अवसर पर भला भूँगी के सिर के बाल बच सकते थे ? लेकिन आज बाबूसाहब ठठाकर हँसे और बोले भूँगी बात बडे पते की कहती है ।
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           भूँगी का शासनकाल साल भर से आगे न चल सका । देवताओं ने बालक के भंगिन का दूध पीने पर आपत्ति की, मोटेराम शास्त्री तो प्रायश्चित्त का प्रस्ताव कर बैठे । दूध तो छुडा दिया गया,  लेकिन प्रायश्चित्त की बात हँसी में उड गयी । महेशनाथ ने फटकारकर कहा, 'प्रायश्चित्त की खूब कही शास्त्रीजी, कल तक उसी भंगिन का खून पीकर पला, अब उसमें छूत घुस गयी । वाह रे आपका धर्म ।
          शास्त्रीजी शिखा फटकारकर बोले यह सत्य है, वह कल तक भंगिन का रक्त पीकर पला । माँस खाकर पला, यह भी सत्य है, लेकिन कल की बात कल थी, आज की बात आज । जगन्नाथपुरी में छूत अछूत सब एक पंगत में खाते हैं, पर यहाँ तो नही खा सकते । बीमारी में तो हम भी कपडे पहने खा लेते हैं, खिचडी तक खा लेते हैं बाबूजी, लेकिन अच्छे हो जाने पर तो नेम का पालन करना ही पडता है । आपतधर्म की बात न्यारी है ।
'तो इसका यह अर्थ है कि धर्म बदलता रहता है कभी कुछ, कभी कुछ' ?
'और क्या ! राजा का धर्म अलग, प्रजा का धर्म अलग, अमीर का धर्म अलग, गरीब का धर्म अलग, राजे -महाराजे जो चाहें खाये, जिसके साथ चाहे खाये,  जिसके साथ चाहें शादी ब्याह करें, उनके लिए कोई बन्धन नही । समर्थ पुरुष हैं । बन्धन तो मध्य वालों के लिए है' ।
        प्रायश्चित्त तो न हुआ, लेकिन भूँगी को गद्दी से उतरना पडा ! हाँ, दान दक्षिणा इतनी मिली की वह अकेले ले न जा सकी और सोने के चूडे भी मिले । एक की जगह दो नयी, सुन्दर साडियाँ मामूली नैनसुख की नही, जैसी लडकियों की बार मिली थी ।

Munshi prem chand ki kahaniyan


          इसी साल प्लेग ने जोर बाँधा और गूदड पहले ही चपेट में आ गया । भूँगी अकेली रह गयी, पर गृहस्थी ज्यों की त्यों चलती रही । लोग ताक लगाये बैठे थे कि भूँगी अब गयी । फलाँ भंगी से बातचीत हुई, फलाँ चौधरी आये, लेकिन भूँगी न कहीं आयी, न कहीं गयी, यहाँ तक कि पाँच साल बीत गये और उसका बालक मंगल, दुर्बल और सदा रोगी रहने पर भी, दौडने लगा । सुरेश के सामने पिद्दी सा लगता था ।
munshi premchand ki kahani, hindi kahani
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          एक दिन भूँगी महेशनाथ के घर का परनाला साफ कर रही थी, महीनों से गलीज जमा हो रहा था । आँगन में पानी भरा रहने लगा था । परनाले में एक लम्बा मोटा बाँस डालकर जोर से हिला रही थी । पूरा दाहिना हाथ परनाले के अन्दर था कि एकाएक उसने चिल्लाकर हाथ बाहर निकाल लिया और उसी वक्त एक काला साँप परनाले से निकलकर भागा । लोगों ने दौडकर उसे मार तो डाला, लेकिन भूँगी को न बचा सके । समझे, पानी का साँप है, विषैला न होगा, इसलिए पहले कुछ गफलत की गयी, जब विष देह में फैल गया और लहरें आने लगी, तब पता चला कि वह पानी का साँप नही, गेहुँवन था ।
         मंगल अब अनाथ था । दिनभर महेशबाबू के द्वार पर मँडराया करता, घर में जूठन इतना बचता था कि ऐसे - ऐसे दस पाँच बालक पल सकते थे । खाने की कोई कमी न थी । हाँ, उसे तब बुरा जरूर लगता था, जब उसे मिट्टी के कसोरों में ऊपर से खाना दिया जाता था । सब लोग अच्छे - अच्छे बरतनों में खाते हैं, उसके लिए मिट्टी के कसोरे ! यों उसे इस भेदभाव का बिलकुल ज्ञान न होता था, लेकिन गाँव के लडके चिढा - चिढा कर उसका अपमान करते रहते थे । कोई उसे अपने साथ खेलाता भी न था । यहाँ तक कि जिस टाट पर वह सोता था, वह भी अछूत था ।
         मकान के सामने एक नीम का पेड था । इसी के नीचे मंगल का डेरा था । एक फटा सा टाट का टुकडा, दो मिट्टी के कसोरे और एक धोती, जो सुरेश बाबू की उतरन थी, जाडा, गरमी, बरसात हरेक मौसम में वह जगह एक सी आरामदेह थी और भाग्य का बली मंगल झुलसती हुई लू, गलते हुए जाडे और मूसलाधार वर्षा में भी जिन्दा और पहले से कही स्वस्थ था । बस, उसका कोई अपना था, तो गाँव का एक कुत्ता, जो अपने सहवर्गियों के जुल्म से दुखी होकर मंगल की शरण आ पडा था । दोनों एक ही खाना खाते, एक ही टाट पर सोते, तबियत भी दोनों की एक सी थी और दोनों एक दूसरे के स्वभाव को जान गये थे । कभी आपस में झगडा न होता ।
            गाँव के धार्मात्मा लोग बाबूसाहब की इस उदारता पर आश्चर्य करते । ठीक द्वार के सामने पचास हाथ भी न होगा मंगल का पडा रहना उन्हें सोलहों आने धर्म विरुद्ध जान पडता था । छि, छि: ! यही हाल रहा, तो थोडे ही दिनों में धर्म का अन्त ही समझो । भंगी को भी भगवान ने ही रचा है, यह हम भी जानते हैं । उसके साथ हमें किसी तरह का अन्याय न करना चाहिए, यह किसे नही मालूम ? भगवान का तो नाम ही पतित पावन है, लेकिन समाज की मर्यादा भी कोई वस्तु है । उस द्वार पर जाते हुए संकोच होता है । गाँव के मालिक हैं, जाना तो पडता ही है, लेकिन बस यही समझ लो कि घृणा होती है ।
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          मंगल और टामी में गहरी बनती थी । मंगल कहता देखो भाई टामी, जरा और खिसककर सोओ । आखिर मैं कहाँ लेटूँ ? सारा टाट तो तुमने घेर लिया । टामी कूँ - कूँ करता, दुम हिलाता और खिसक जाने के बदले और ऊपर चढ आता एवं मंगल का मुँह चाटने लगता । शाम को वह एक बार रोज अपना घर देखने और थोडी देर रोने जाता । पहले साल फूस का छप्पर गिर पडा, दूसरे साल एक दीवार गिरी और अब केवल आधी - आधी दीवारें खडी थी,  जिनका ऊपरी भाग नोकदार हो गया था । यही उसे स्नेह की सम्पत्ति मिली थी । वही स्मृति, वही आकर्षण, वही प्यार उसे एक बार उस ऊजड में खींच ले जाता था और टामी सदैव उसके साथ होता था । मंगल नोकदार दीवार पर बैठ जाता और जीवन के बीते और आनेवाले स्वप्न देखने लगता और बार - बार उछलकर उसकी गोद में बैठने की असफल चेष्टा करता ।
          एक दिन कई लडके खेल रहे थे, मंगल भी पहुँचकर दूर खडा हो गया । या तो सुरेश को उस पर दया आयी, या खेलनेवालों की जोडी पूरी न पडती थी, कह नही सकते । जो कुछ भी हो, तजवीज की कि आज मंगल को भी खेल में शरीक कर लिया जाय । यहाँ कौन देखने आता है ।
'क्यों रे मंगल, खेलेगा' ।
मंगल बोला, 'ना भैया, कहीं मालिक देख लें, तो मेरी चमडी उधेड दी जाय । तुम्हें क्या, तुम तो अलग हो जाओगे' ।
सुरेश ने कहा, 'तो यहाँ कौन आता है देखने बे ? चल, हम लोग सवार - सवार खेलेंगे, तू घोडा बनेगा, हम लोग तेरे ऊपर सवारी करके दौडायेंगे' ?
मंगल ने शंका की, 'मैं बार - बार घोडा ही रहूँगा, कि सवारी भी करूँगा ? यह बता दो' ।
यह प्रश्न टेढा था । किसी ने इस पर विचार न किया था । सुरेश ने एक क्षण विचार करके कहा, 'तुझे कौन अपनी पीठ पर बिठायेगा, सोच' ?
'आखिर तू भंगी है कि नही' ?
मंगल भी कडा हो गया । बोला, 'मैं कब कहता हूँ कि मैं भंगी नही हूँ, लेकिन तुम्हें मेरी ही माँ ने अपना दूध पिलाकर पाला है । जब तक मुझे भी सवारी करने को न मिलेगी, मैं घोडा न बनूँगा । तुम लोग बडे जाघड  हो । आप तो मजे से सवारी करोगे और मैं घोडा ही बना रहूँ' ।
सुरेश ने डाँटकर कहा, 'तुझे घोडा बनना पडेगा' और मंगल को पकडने दौडा । मंगल भागा, सुरेश ने दौडाया । मंगल ने कदम और तेज किया । सुरेश ने भी जोर लगाया, मगर वह बहुत खा खाकर थुल - थुल हो गया था । और दौडने में उसकी साँस फूलने लगती थी । आखिर उसने रुककर कहा, 'आकर घोडा बनो मंगल, नही तो कभी पा जाऊँगा, तो बुरी तरह पीटूँगा' ।
'तुम्हें भी घोडा बनना पडेगा' ।
'अच्छा हम भी बन जायँगे' ।
'तुम पीछे से निकल जाओगे । पहले तुम घोडा बन जाओ । मैं सवारी कर लूँ, फिर मैं बनूँगा' ।
सुरेश ने सचमुच चकमा देना चाहा था । मंगल का यह मुतालबा सुनकर साथियों से बोला, 'देखते हो इसकी बदमाशी, भंगी है न' ।
तीनों ने मंगल को घेर लिया और उसे जबरदस्ती घोडा  बना दिया । सुरेश ने चटपट उसकी पीठ पर आसन जमा लिया और टिकटिक करके बोला, 'चल घोडे चल' !

Munshi Premchand


         मंगल कुछ देर तक तो चला, लेकिन उस बोझ से उसकी कमर टूटी जाती थी । उसने धीरे से पीठ सिकोडी और सुरेश की रान के नीचे से सरक गया । सुरेश महोदय लद से गिर पडे और भोंपू बजाने लगे माँ ने सुना, सुरेश कहीं रो रहा है । सुरेश कहीं रोये, तो उनके तेज कानों में जरूर भनक पड जाती थी और उसका रोना भी बिलकुल निराला होता था, जैसे छोटी लाइन के इंजन की आवाज । महरी से बोली, 'देख तो, सुरेश कहीं रो रहा है, पूछ तो किसने मारा है' ।
          इतने में सुरेश खुद आँखें मलता हुआ आया । उसे जब रोने का अवसर मिलता था, तो माँ के पास फरियाद लेकर जरूर आता था । माँ मिठाई या मेवे देकर आँसू पोंछ देती थी । आप थे तो आठ साल के, मगर थे बिलकुल गावदी । हद से ज्यादा प्यार ने उसकी बुद्धि के साथ वही किया था, जो हद से ज्यादा भोजन ने उसकी देह के साथ ।
माँ ने पूछा, 'क्यों रोता है सुरेश, किसने मारा' ?
सुरेश ने रोकर कहा, 'मंगल ने छू दिया' ।
माँ को विश्वास न आया । मंगल इतना निरीह था कि उससे किसी तरह की शरारत की शंका न होती थी, लेकिन जब सुरेश कसमें खाने लगा, तो विश्वास करना लाजिम हो गया । मंगल को बुलाकर डाँटा, 'क्यों रे मंगल, अब तुझे बदमाशी सूझने लगी । मैंने तुझसे कहा था, सुरेश को कभी मत छूना, याद है कि नही, बोल' ।
मंगल ने दबी आवाज से कहा, 'याद क्यों नही है' ।
'तो फिर तूने उसे क्यों छुआ' ?
'मैंने नही छुआ' ।
'तूने नही छुआ, तो वह रोता क्यों था' ?
'गिर पडे, इसलिए रोने लगे' ।
चोरी और सीनाजोरी । देवी जी दाँत पीसकर रह गयी । मारती, तो उसी दम स्नान करना पडता । छडी तो हाथ में लेनी ही पडती और छूत का विद्युत प्रवाह इस छडी के रास्ते उनकी देह में प्रविष्ट हो जााता, इसलिए जहाँ तक गालियाँ दे सकी, दी और हुक्म दिया कि 'अभी के अभी यहाँ से निकल जा । फिर जो इस द्वार पर तेरी सूरत नजर आयी, तो खून ही पी जाऊँगी । मुफ्त की रोटियाँ खा खाकर शरारत सूझती है' आदि ।
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           मंगल में गैरत तो क्या थी, हाँ डर था । चुपके से अपने सकोरे उठाये, टाट का टुकडा बगल में दबाया, धोती कन्धो पर रखी और रोता हुआ वहाँ से चल पडा । अब वह यहाँ कभी न आयेगा । यही तो होगा कि भूखों मर जायेगा । क्या हरज है ? इस तरह जीने से फायदा ही क्या ? गाँव में उसके लिए और कहाँ ठिकाना था ? भंगी को कौन पनाह देता ? उसी खंडहर की ओर चला, जहाँ भले दिनों की स्मृतियाँ उसके आँसू पोंछ सकती थी और खूब फूट - फूटकर रोया । उसी क्षण टामी भी उसे ढूँडता हुआ पहुँचा और दोनों फिर अपनी व्यथा भूल गये ।
          ज्यों - ज्यों दिन का प्रकाश क्षीण होता जाता था, मंगल की ग्लानि भी क्षीण होती जाती थी । बचपन को बेचैन करने वाली भूख देह का रक्त पी पीकर और भी बलवान होती जाती थी । आँखें बार - बार कसोरों की ओर उठ जाती । वहाँ अब तक सुरेश की जूठी मिठाइयाँ मिल गयी होती । यहाँ क्या धूल फाँके ?
उसने टामी से सलाह की खाओगे क्या टामी ? मैं तो भूखा लेटा रहूँगा ।
टामी ने कूँ - कूँ करके शायद कहा, 'इस तरह का अपमान तो जिन्दगी भर सहना है, यों हिम्मत हारोगे, तो कैसे काम चलेगा ? मुझे देखो, कभी किसी ने डण्डा मारा, चिल्ला उठा, फिर जरा देर बाद दुम हिलाता हुआ उसके पास जा पहुँचा । हम तुम दोनों इसीलिए बने हैं भाई !
मंगल ने कहा, 'तो तुम जाओ, जो कुछ मिले खा लो, मेरी परवाह न करो' ।
टामी ने अपनी श्वान भाषा में कहा, 'अकेला नही जाता, तुम्हें साथ लेकर चलूँगा' ।
'मैं नही जाता' 
'तो मैं भी नही जाता' 
'भूखों मर जाओगे'
'तो क्या तुम जीते रहोगे' ?
'मेरा कौन बैठा है, जो रोयेगा' ?
'यहाँ भी वही हाल है भाई, क्वार में जिस कुतिया से प्रेम किया था, उसने बेवफाई की और अब कल्लू के साथ है । खैरियत यही हुई कि अपने बच्चे लेती गयी, नही तो मेरी जान गाढे में पड जाती । पाँच - पाँच बच्चों को
कौन पालता' ।
एक क्षण के बाद भूख ने एक दूसरी युक्ति सोच निकाली । 'मालकिन हमें खोज रही होगी, क्या टामी' ?
'और क्या ? बाबूजी और सुरेश खा चुके होंगे । कहार ने उनकी थाली से जूठन निकाल लिया होगा और हमें पुकार रहा होगा' ।
'बाबूजी और सुरेश दोनों की थालियों में घी खूब रहता है और वह मीठी - मीठी चीज हाँ मलाई' ।
'सब का सब घूरे पर डाल दिया जायगा' ।
'देखें, हमें खोजने कोई आता है' ?
'खोजने कौन आयेगा, क्या कोई पुरोहित हो ? एक बार 'मंगल - मंगल' होगा और बस, थाली परनाले में उँडेल दी जायेगी' ।
'अच्छा, तो चलो चलें । मगर मैं छिपा रहूँगा, अगर किसी ने मेरा नाम लेकर न पुकारा, तो मैं लौट आऊँगा । यह समझ लो' ।
            दोनों वहाँ से निकले और आकर महेशनाथ के द्वार पर अँधेरे में दबककर खडे हो गये, मगर टामी को सब्र कहाँ ? वह धीरे से अन्दर घुस गया । देखा, महेशनाथ और सुरेश थाली पर बैठ गये हैं । बरोठे में धीरे से बैठ गया, मगर डर रहा था कि कोई डण्डा न मार दे । नौकर में बातचीत हो रही थी । एक ने कहा, 'आज मँगलवा नही दिखायी देता । मालकिन ने डाँटा था, इसलिए भागा है सायद' ।
दूसरे ने जवाब दिया, 'अच्छा हुआ, निकाल दिया गया । सबेरे - सबेरे भंगी का मुँह देखना पडता था ।
मंगल और अँधेरे में खिसक गया । आशा गहरे जल में डूब गयी । महेशनाथ थाली से उठ गये नौकर हाथ धुला रहा है । अब हुक्का पीयेंगे और सोयेंगे । सुरेश अपनी माँ के पास बैठा कोई कहानी सुनता - सुनता सो जायगा ! गरीब मंगल की किसे चिन्ता है ? इतनी देर हो गयी, किसी ने भूल से भी न पुकारा ।

और कहानियाँ पढें

          कुछ देर तक वह निराश सा वहाँ खडा रहा, फिर एक लम्बी साँस खींचकर जाना ही चाहता था कि कहार पत्तल में थाली का जूठन ले जाता नजर आया । मंगल अँधेरे से निकलकर प्रकाश में आ गया । अब मन को कैसे रोके ?
कहार ने कहा, 'अरे, तू यहाँ था ? हमने समझा कि कहीं चला गया । ले, खा ले, मैं फेंकने ले जा रहा था' ।
मंगल ने दीनता से कहा, 'मैं तो बडी देर से यहाँ खडा था' ।
'तो बोला, क्यों नही' ?
'मारे डर के'
'अच्छा, ले खा ले' 
उसने पत्तल को ऊपर उठाकर मंगल के फैले हुए हाथों में डाल दिया । मंगल ने उसकी ओर ऐसी आँखों से देखा, जिसमें दीन कृतज्ञता भरी हुई थी । टामी भी अन्दर से निकल आया था । दोनों वहीं नीम के नीचे पत्तल
में खाने लगे । मंगल ने एक हाथ से टामी का सिर सहलाकर कहा, 'देखा, पेट की आग ऐसी होती है ! यह लात की मारी हुई रोटियाँ भी न मिलती, तो क्या करते' ? टामी ने दुम हिला दी ।
'सुरेश को अम्माँ ने पाला था'
टामी ने फिर दुम हिलायी ।
'लोग कहते हैं, दूध का दाम कोई नहीं चुका सकता और मुझे दूध का यह दाम  मिल रहा है' ।
टामी ने फिर दुम हिलायी ।
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Thursday, 23 January 2020

"ओहदे का नशा" Hindi kahani


          यह एक बेहतरीन hindi kahani दो अलग - अलग व्यक्तिव के व्यक्तियों का चित्रण करती है और यह प्रेरणा देती है कि व्यक्ति चाहे कोई भी हो, किसी भी जाति, धर्म, पन्थ, मजहब, क्लास या बैग्राउंड या देश हो या विदेश कहीं से भी हो उसके चरित्र की असली पहचान उसका व्यक्तित्व तय करता है और व्यक्तित्व का निर्माण मानसिकता से होता है।

Hindi kahani ओहदे का नशा


         सुबह – सुबह का समय था, सैनिकों की एक बटालियन अपने देश के बहुत महत्वपूर्ण सुरक्षा क्षेत्र में खुदाई कर रही थी । उनका कमाँडिंग अफसर जोर - जोर से चिल्ला रहा था, गालियाँ दे रहा था, और अपनी बन्दूक से बीच - बीच में हवाई फायर कर रहा था “जल्दी करो ! तेजी से हाथ चलाओ, कामचोर हो गए हो तुम, बहुत आलसी हो गए हो, निकम्मो अगर दो घंटे में काम पूरा नही हुआ, तो तुम सबकी खैर नही”…..।
Hindi kahani, hindi story
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           सैनिक पूरी मेहनत से काम कर रहे थे, किन्तु अफसर की डाँट और चिल्लाना रुक नही रहा था । तभी एक आर्मी की जीप जो वहाँ से गुजर रही थी, अफसर को बेवजह चिल्लाते देख, रुक गयी । उसमें से एक अधेड उम्र का व्यक्ति नीचे उतरा वह साधारण कपडों में था उसने बर्दी नही पहनी हुई थी । और अफसर से बोला– ‘ सर ये लोग तो बडी मेहनत से काम कर रहे हैं, आप काम में इनका हाथ बटाने की बजाय इन पर चिल्ला रहे हो, बुरा भला कह रहे हो अगर आप भी इनका हाथ बटाते, इनकी मदद करते तो काम और भी जल्दी हो सकता है’ ।
        पहले तो अफसर ने हैरानी से उस व्यक्ति की ओर देखा और एक पल के बाद बोला…
अफसर – मैं ? मैं करूँगा काम ? जानते भी हो मैं कौन हूँ ?
व्यक्ति – नही सर मैं आपको नही जानता हूँ किन्तु…..
( अफसर बीच में बोला )
अफसर - मैं इन सबका कमाँडिंग अफसर हूँ । और मेरा काम "काम करना नही इनसे काम करवाना है…. इनको ऑडर देना है", अगर तुम्हें मदद करने की ज्यादा ही उत्सुकता है, तो क्यों न तुम ही इनकी मदद कर दो ! किसने रोका है तुम्हें ।
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         ठीक है सर ! यह कह के वह व्यक्ति भी सैनिकों के साथ काम करने लगा । यह देख अफसर को थोडी हैरानी हुई और अब उसने चिल्लाना भी बंद कर दिया था, वह व्यक्ति पूरी मेहनत से सैनिकों के साथ काम में जुट गया और जब तक कार्य पूरा नही हुआ तब तक खुदाई करता रहा । 
           कोई दो घंटे की कडी मेहनत के बाद खुदाई का कार्य समाप्त हुआ और कार्य समाप्त होने के बाद उस व्यक्ति ने सभी सैनिकों से हाथ मिलाया और उनकी खूब प्रशंसा की । ‘आप सब लोग बहुत मेहनती हो और आप पर देश को नाज है मैं बहुत खुश हूँ कि आप जैसे लोग सेना में हैं और ओ भी हमारी कोर कमाँड में ।
        उत्सुकता में सैनिकों ने उनका परिचय और काम में मदद करने का कारण पूछा, जब उस व्यक्ति ने अपना परिचय दिया तो सैनिकों की खुशी का ठिकाना न रहा, उनका मनोबल सातवें आसमान पर पहुँच गया । उन्होंने पूरे सम्मान से उन्हें सल्यूट किया और उनके व्यवहार की प्रशंसा करते हुए गर्मजोसी से तालिया बजा कर उनका स्वागत किया ।
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           वह व्यक्ति अफसर के पास गया । और बोला “अगली बार जब तुम्हारा ओहदा तुम्हें मदद करने से रोके, तो मुझे बता देना । मैं तुम्हें हल सुझा दूँगा” ।

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         बटालियन  अफसर के होश उड गए, क्योंकि वह व्यक्ति कोई और नही अपने ओहदे का कोई अहंकार न करते हुए , विनम्रता का परिचय देने वाले यह व्यक्ति उस वक्त के कोर कमाँडिंग ऑफिसर और बाद में अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति ‘जॉर्ज वाँशिंगटन' थे।

शिक्षा – अहंकार चाहे किसी भी बात का हो ( पद, प्रतिष्ठा या अन्य किसी चीज का ) मनुष्य को हीन और निर्दयी बना देता है, अहंकारी मनुष्य का कोई भी मन से सम्मान नही करता । जबकि जो व्यक्ति अहंकार नही करता है उसका आदर सब मन से करते हैं।

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Tuesday, 21 January 2020

चुहिया का स्वयंवर


          Panchatantra ki kahaniyon में चुहिया का स्वयंवर एक प्रशिद्ध कहानी हैै । गंगा नदी के किनारे एक तपस्वियों का आश्रम था । वहाँ याज्ञवल्क्य नाम के मुनि रहते थे । मुनिवर एक दिन नदी के किनारे जल लेकर आचमन कर रहे थे कि पानी से भरी हथेली में ऊपर से एक चुहिया गिर गई । उस चुहिया को आकाश में बाज लिये जा रहा था । उसके पंजे से छूटकर वह नीचे गिर गई । मुनि ने उसे पीपल के पत्ते पर रखा और फिर गंगाजल में स्नान किया । 
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Panchtantra ki kahaniyan
         चुहिया में अभी प्राण शेष थे । मुनि उसे अपने आश्रम में लाये  और मुनि ने अपने प्रताप से उसे कन्या का रुप दे दिया । अपनी पत्‍नी को कन्या अर्पित करते हुए मुनि ने कहा कि इसे अपनी ही लडकी की तरह पालना । उनकी अपनी कोई सन्तान नही थी , इसलिये मुनि पत्‍नी ने उसका लालन, पालन बडे प्रेम से किया । १४ वर्ष तक वह उनके आश्रम में पलती रही ।
         जब वह विवाह योग्य अवस्था की हो गई तो पत्‍नी ने मुनि से कहा- "नाथ ! अपनी कन्या अब विवाह योग्य हो गई है । इसके विवाह का प्रबन्ध कीजिये" ।
मुनि ने कहा- "मैं अभी आदित्य को बुलाकर इसे उसके हाथ सौंप देता हूँ । यदि इसे स्वीकार होगा तो उसके साथ विवाह कर लेगी, अन्यथा नही" ।

Panchtantr ki kahaniyan


मुनि ने सूर्य देव को बुलाया और बालिका से पूछा "क्या तुम्हें सूर्य देव स्वीकार हैं" ?
पुत्री ने उत्तर दिया- "तात ! यह तो आग जैसा गरम है, मुझे स्वीकार नही । इससे अच्छा कोई वर बुलाइये" ।
मुनि ने सूर्य से पूछा कि वह अपने से अच्छा कोई वर बतलाये ।
सूर्य ने कहा- "मुझ से अच्छे मेघ हैं, जो मुझे ढककर छिपा लेते हैं" ।
मुनि ने मेघ को बुलाकर पूछा- "क्या यह तुम्हें स्वीकार है" ?
कन्या ने कहा- "यह तो बहुत काला है । इससे भी अच्छे किसी वर को बुलाओ" ।
मुनि ने मेघ से भी पूछा कि उससे अच्छा कौन है ।
मेघ ने कहा, "हम से अच्छी वायु है, जो हमें उडाकर दिशा, दिशाओं में ले जाती है" ।
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मुनि ने वायु को बुलाया और कन्या से स्वीकृति पूछी । कन्या ने कहा- "तात ! यह तो बडी चंचल है । इससे भी किसी अच्छे वर को बुलाओ" ।
मुनि ने वायु से भी पूछा कि उस से अच्छा कौन है । वायु ने कहा, "मुझ से अच्छा पर्वत है, जो बडी से बडी आँधी में भी स्थिर रहता है" ।
मुनि ने पर्वत को बुलाया और कन्या से पूछा तो कन्या ने कहा- "तात ! यह तो बडा कठोर और गंभीर है, इससे अधिक अच्छा कोई वर बुलाओ" ।
मुनि ने पर्वत से कहा कि वह अपने से अच्छा कोई वर सुझाये । तब पर्वत ने कहा- "मुझ से अच्छा चूहा है, जो मुझे तोडकर अपना बिल बना लेता है" ।

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मुनि ने तब चूहे को बुलाया और कन्या से कहा- "पुत्री ! यह मूषकराज तुझे स्वीकार हो तो इससे विवाह कर ले" ।
मुनिकन्या ने मूसकराज को बडे ध्यान से देखा । उसके साथ उसे विलक्षण अपनापन अनुभव हो रहा था । प्रथम दृष्टि में ही वह उस पर मुग्ध हो गई और बोली- "मुझे मूसिका बनाकर मूसकराज के हाथ सौंप दीजिये" ।
मुनि ने अपने तपोबल से उसे फिर चुहिया बना दिया और चूहे के साथ उसका विवाह कर दिया ।
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Hindi kahani "मार्श मेलो थ्योरी"



         यह Hindi Kahani एक अध्यापक और उनके कुछ स्टूडेंट्स की है । शिक्षक और स्टूडेंट का अपना एक अलग ही रिश्ता होता है, सारे रिश्तों से अलग और जुदा । एक अनजान व्यक्ति के प्रति पहले ही दिन से अनेक भाव हमारे मन में अपनी जगह सुनिश्चित कर लेते हैं ।

Hindi kahani "मार्श मेलो थ्योरी", hindi kahaniyan
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         हम अपने पूरे जीवन काल में किसी और के साथ सायद ही इतनी जल्दी सहज हो पाते हों किन्तु अध्यापक से तो मिलने से पहले ही हमें ज्ञात होता है कि हमें किस तरह का व्यवहार करना है ।
          एक बार की बात है एक विद्यालय में अध्यापक क्लास रूम में आये आज उनके हाथ में एक बैग भी था सदैव की तरह बच्चों ने उनका अभिवादन किया उन्होंने बैग से पुस्तक निकाली और बच्चों को पढाने लगे ।
        कुछ देर पढाने के बाद उन्होंने बच्चों को पुस्तक बन्द कर के टेबल की दराज में रखने को कहा और अपने बैग से  टॉफियों से भरी एक थैली निकाली और यह कहते हुए की अभी खाना नही, क्लास के सभी बच्चों को एक - एक टॉफी दी यह उस वक्त की सबसे प्रचलित टॉफी थी । फोम की तरह नरम और अत्यंत स्वादिस्ट । सबको टॉफियाँ देने के बाद इससे पहले कि कोई कुछ पूछ पाता उन्होंने एक अजीब बात कही ।

Hindi kahani "मार्श मेलो थ्योरी"

         सुनो, बच्चो ! आपको मैंने जो टॉफियाँ दी हैं सब अपनी - अपनी टेबल पर रख दो मैं दस मिनट के लिए बाहर जा रहा हूँ,  मेरे लौटने तक आपको अपनी टॉफी नही खानी है । मैं ठीक दस मिनट में आ जाऊँगा मेरे वापस आने के बाद आप अपनी - अपनी टॉफियाँ खा सकते हो और यह कहकर वो क्लास रूम से बाहर चले गए ।
        कुछ पल के लिए तो क्लास में सन्नाटा छा गया, हर बच्चा उसके सामने टेबल पर पडी टॉफी को देख रहा था । कुछ देर बाद कोई हँस रहा था तो कोई यह सोच रहा था कि आखिर सर टॉफी खाने को मना कर के क्यों गए तो कुछ बच्चे आपस मे बातें कर रहे थे और कुछ ने तो टॉफी खा ली हर किसी का अपना रियेक्सन था किन्तु हर गुजरते पल के साथ खुद को रोकना मुश्किल हो रहा था ।
         आखिर दस मिनट पूरे हुए और अध्यापक क्लास रूम में आ गए । उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा "मैं लेट तो नही हूँ ठीक दस मिनट में आ गया न" और फिर उन्होंने समीक्षा की और देखा कि कितने बच्चों के टेबल में टॉफीयाँ हैं । पूरे क्लास रूम में सिर्फ सात बच्चे थे, जिनकी टॉफियाँ ज्यूँ की त्यूँ थी,जबकि बाकी सभी बच्चे अपनी - अपनी टॉफी खाकर उसके रंग और स्वाद आदि पर टिप्पणी कर रहे थे ।


Hindi kahani "मार्श मेलो थ्योरी", hindi kahaniyan
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           टीचर ने अपनी डायरी निकाली और उन सात बच्चों के नाम और उनसे सम्बंधित  कुछ और जानकारी को अपनी डायरी में दर्ज कर दिया और साथ ही उन सभी बच्चों के नाम और जानकारी भी उसी डायरी में अलग से दर्ज कर दी जिन्होंने पहले ही अपनी टॉफी खा ली थी । जानकारी दर्ज करने के बाद उन्होंने फिर से पढाना शुरू कर दिया ।
          क्या आप जानते हैं ये शिक्षक कौन थे ? इस शिक्षक का नाम प्रोफेसर वाल्टर मिसेल था । प्रोफेसर वाल्टर मिसेल ने यह सब एक रिसर्च करने के मकसद से किया था । समय बीतता गया और बितते समय के साथ नए - नए बच्चे स्कूल में आये और कुछ समय पश्चात ओ क्लास पास आउट हो के स्कूल से चली गयी ।
         समय तो नियमित अपनी गति से चलता ही रहता है और बीतते समय के साथ परिस्थितियाँ भी बदल जाती हैं उस क्लास के पास आउट होने के कुछ वर्षों बाद प्रोफेसर वाल्टर ने अपनी वही डायरी निकाली और जिन्होंने टॉफियाँ नही खाई थी उन सात बच्चों के नाम निकाल कर अलग से एक पेपर पर लिखा और बाकी के बच्चों का नाम एक अलग पेपर पर लिखा फिर उन्होंने उनके बारे में शोध शुरू कर दिया ।
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          काफी खोजबीन और जाँच पडताल के एक लंबे संघर्ष के बाद, उन्हें यह पता चला कि जिन्होंने टॉफी नही खाई थी उन सातों बच्चों ने अपने जीवन में कई सफलताओं को हासिल किया है और आज भी वो अपने - अपने फील्ड में  काफी सफल हैं ।
         प्रोफेसर वाल्टर ने साथ - साथ बाकी वर्ग के छात्रों की भी समीक्षा की थी तो उन्हें यह पता चला कि जिन बच्चों ने टॉफियाँ खा ली थी उनमें से अधिकतर एक आम जीवन जी रहे थे, जबकी कुछ लोग तो ऐसे भी थे जिन्हें सख्त आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों का सामना करना पड रहा था ।
         अपने सभी प्रयास और शोध को जब प्रोफेसर वाल्टर ने पब्लिक किया तो उसका परिणाम प्रोफेसर वाल्टर ने एक वाक्य में निकाला और वह यह था ।

"जो आदमी दस मिनट तक धैर्य नही रख सकता, वह जीवन में कभी आगे नही बढ सकता है” ।

          प्रोफेसर वाल्टर के इस शोध को दुनिया भर में शोहरत मिली और इसका नाम "मार्श मेलो थ्योरी" रखा गया  क्योंकि प्रोफेसर वाल्टर ने क्लास के सभी बच्चों को जो टॉफियाँ  दी थी उसका नाम "मार्श मेलो" था ।
        इस थ्योरी के अनुसार दुनिया के सबसे सफल लोगों में कई गुणों के साथ - साथ एक गुण 'धैर्य' भी पाया जाता है, क्योंकि यह खूबी इन्सान के बर्दाश्त करने की ताकत को बढाती है, जिसकी बदौलत इन्सान किसी भी कठिन से कठिन परिस्थितियों में निराश नही होता है और वह एक असाधारण व्यक्तित्व बन कर उभरता है।
इसलिये मनुष्य को हमेशा धैर्य का परिचय देना चाहिए किसी भी परिस्थिति में धैर्य नही खोना चाहिए धैर्य ही जीवन का सार है ।
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